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________________ हरिवंशपुराणे भूमिशय्याव्रतं दन्तमलमार्जनवर्जनम् । तपःसंयमचारित्रं परीषहजयः परः ॥१२९॥ अनुप्रेक्षाश्च धर्मश्च क्षमादिदशलक्षणः । ज्ञानदर्शनचारित्रतपोविनयसेवनम् ॥१३॥ इति श्रमणधर्मोऽयं कर्मनिर्मोक्षहेतुकः । सुरासुरनराध्यक्षं जिनोक्तस्तं तदा नराः ॥१३१॥ संसारभीरवः शुद्धजातिरूपकुलादयः । सर्वसंगविनिर्मुक्ताः शतशः प्रतिपेदिरे ॥१३२॥ सम्यग्दर्शनसंशुद्धाः शुद्धकवसनावृताः । सहस्रशो दधुः शुद्धा नार्यस्तत्रार्यिकाव्रतम् ॥१३३॥ पञ्चधाणुव्रत केचित् त्रिविधं च गुणवतम् । शिक्षाव्रतं चतुर्भेदं तत्र स्त्रीपुरुषा दधुः ॥१३४॥ तिर्यञ्चोऽपि यथाशक्ति नियमेष्ववतस्थिरे । देवाः सदर्शनज्ञानजिनपूजासु रेमिरे ॥१३५॥ श्रेणिकेन तु यत्पूर्व बहारम्भपरिग्रहात् । परस्थितिकमारब्धं नरकायुस्तमस्तमे ॥१३६॥ तत्त क्षायिकसम्यक्त्वात् स्वस्थितिं प्रथमक्षितौ । प्रापद्वर्षसहस्राणामशीतिं चतुरुत्तराम् ।।१३७॥ त्रयस्त्रिंशत् समुद्राः क्व क्व चेयं मध्यमा स्थितिः । अहो क्षायिकसम्यक्त्वप्रभावोऽयमनुत्तरः ॥१३॥ अकरो वारिषेणो यो योऽभयः स तथा परे । कुमारा मातरश्चैषां पराश्चान्तःपुरस्त्रियः ।।१३९॥ सम्यक्त्वं शीलसदानं प्रोषधं जिनपूजनम् । प्रतिपद्य विनेमुस्तं जिनेन्द्र त्रिजगद्गुरुम् ॥ ४०॥ ततः प्रणम्य देवेन्द्रा जिनेन्द्रं स्तोत्रपूर्वकम् । यथायथं ययुर्युक्ता निजवगैर्निजास्पदम् ॥१४॥ श्रेणिकोऽपि गुणश्रेणीमुच्चकैरभिरूढवान् । अभिष्टुत्य जिनं नत्वा प्रविष्टस्तुष्टधीः पुरम् ।। १४२॥ निःसरद्भिर्विशद्भिश्च सभा जैनी जनोमिमिः । चुशोभ झुमितवेला नदीपूरैरिवाम्बुधेः ॥१४३॥ नहीं करना, एक बार भोजन करना, खड़े-खड़े भोजन करना, वस्त्र धारण नहीं करना, पृथ्वीपर शयन करना, दन्तमल दूर करनेका त्याग करना, बारह प्रकारका तप, बारह प्रकारका संयम, त्र, परीषह विजय. बारह अनुप्रेक्षाएँ, उत्तम क्षमादि दस धर्म, ज्ञान विनय, दर्शन विनय, चारित्र विनय और तप विनयकी सेवा, इस प्रकार सुर, असुर और मनुष्योंके सम्मुख श्री जिनेन्द्र भगवान्ने कर्मक्षयके कारणभूत जिस मुनिधर्मका वर्णन किया था उसे उन सैकड़ों मनुष्योंने स्वीकृत किया था जो संसारसे भयभीत थे, शुद्ध जातिरूप और कुलको धारण करनेवाले थे तथा सब प्रकारके परिग्रहसे रहित थे ॥१२८-१३२।। सम्यग्दर्शनसे शुद्ध तथा एक पवित्र वस्नको धारण करनेवाली हजारों शुद्ध स्त्रियोंने आर्यिकाके व्रत धारण किये ॥१३३॥ कितने ही स्त्री-पुरुषोंने पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत ये श्रावकके बारह व्रत धारण किये ॥१३४॥ तिर्यंचोंने भी यथाशक्ति नियम धारण किये और देव सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा जिन पूजामें लीन हुए ॥१३५।। राजा श्रेणिकने पहले बहुत आरम्भ और परिग्रहके कारण तमस्तमः नामक सातवें नरकको जो उत्कृष्ट स्थिति बांध रखी थी उसे, क्षायिक सम्यग्दर्शनके प्रभावसे प्रथम पथ्वी सम्बन्धी चौरासी हजार वर्षकी मध्यम स्थितिरूप कर दिया ॥१३६-१३७॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि कहां तो तैंतीस सागर और कहां यह जघन्य स्थिति ? अहो, क्षायिक सम्यग्दर्शनका यह अद्भुत लोकोत्तर माहात्म्य है ॥१३८॥ राजा श्रेणिकके अक्रूर, वारिषेण और अभयकुमार आदि पुत्रोंने, इनकी माताओंने तथा अन्तःपुरकी अन्य अनेक स्त्रियोंने सम्यग्दर्शन, शील, दान, प्रोषध और पूजनका नियम लेकर त्रिजगद्गुरु श्री वर्धमान जिनेन्द्रको नमस्कार किया।।१३९-१४०।। तदनन्तर इन्द्र, स्तुतिपूर्वक श्री जिनेन्द्रदेवको नमस्कार कर अपने परिवारके साथ यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥१४१॥ भावों की उत्तम श्रेणीपर आरूढ़ हुआ राजा श्रेणिक भी श्री वर्धमान जिनेन्द्रकी स्तुति कर तथा नमस्कार कर सन्तुष्ट होता हुआ नगर में प्रविष्ट हुआ॥१४२॥ जिस प्रकार समुद्रको बेला क्षोभको प्राप्त हुए नदीके पूरोंसे सुशोभित हो जाती है उसी प्रकार १. सुरासुरनरप्रत्यक्षम् । २. परा उत्कृष्टा ३३ सागरप्रतिमा स्थितिर्यस्य तत् परिस्थितिक-म.। ३. सप्तमनरके। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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