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________________ द्वितीयः सर्गः ततो जिनोक्तत्वार्थमार्गश्रद्धानलक्षणम् । शङ्काकाङ्क्षानि दानादिकलङ्कविगमोज्ज्वलम् ॥ ११४ ॥ सम्यग्दर्शनसद्रत्नं ज्ञानालंकारनायकम् । स्वकर्णहृदयेष्वेकं पिनद्धमखिलाङ्गिमिः ॥ ११५ ॥ कायेन्द्रियगुणस्थान जीवस्थान कुलायुषाम् । मेदान् योनिविकल्पांश्च निरूप्यागमचक्षुषा ॥ ११६ ॥ क्रियासु स्थानपूर्वासु वधादिपरिवर्जनम् । षण्णां जीवनिकायानामहिंसाद्यं महाव्रतम् ||११७|| यद्वागद्वेषमोहेभ्यः परतापकरं वचः । निवृत्तिस्तु ततः सत्यं तद् द्वितीयं महाव्रतम् ॥११८॥ अल्पस्य महतो वापि परद्रव्यस्य साधुना । अनादानमदत्तस्य तृतीयं तु महाव्रतम् ॥ ११९ ॥ स्त्रीपुंसंगपरित्यागः कृतानुमतकारितैः । ब्रह्मचर्यमिति प्रोक्तं चतुर्थं तु महाव्रतम् ॥ १२० ॥ बाह्याभ्यन्तरवर्तिभ्यः सर्वेभ्यो विरतिर्यतः । स्वपरिग्रहदोषेभ्यः पञ्चमं तु महाव्रतम् ॥ १२१ ॥ चक्षुर्गोचरजीवौघान् परिहृत्य यतेर्यतः । ईर्यासमितिराद्या सा व्रतशुद्धिकरी मता ॥ १२२ ॥ काश्यपारुष्यं यतेर्यत्नवतः सदा । भाषणं धर्मकार्येषु भाषासमितिरिष्यते ॥ १२३॥ पिण्डशुद्धिविधानेन शरीरस्थितये तु यत् । आहारग्रहणं सा स्यादेषणासमितिर्यतेः ॥ १२४॥ निक्षेपणं यदादानमीक्षित्वा योग्यवस्तुनः । समितिः सा तु विज्ञेया निक्षेपादाननामिका ॥ १२५ ॥ शरीरान्तर्मलत्यागः प्रगतासु सुभूमिषु । चत्तरसमितिरेषा तु प्रतिष्ठापनिका मता ॥ १२६ ॥ एवं समितयः पञ्च गोप्यास्तिस्रस्तु गुप्तयः । वाङ्मनः काययोगानां शुद्धरूपाः प्रवृत्तयः ॥ १२७॥ चित्तेन्द्रियनिरोधश्च पडावश्यकसविक्रयाः । लोचास्नानैकभक्तं च स्थितिभुक्तिरचेलता ॥ १२८ ॥ I बिना हिलाये ही निकली हुई भगवान्‌की वाणीने तियंच, मनुष्य तथा देवोंका दृष्टिमोह नष्ट कर दिया था ॥ ११३ ॥ तदनन्तर जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कथित तत्त्वार्थं और मार्गका श्रद्धान करना ही जिसका लक्ष है, जो शंका, कांक्षा, निदान आदि दोषोंके अभावसे उज्ज्वल है तथा सम्यग्ज्ञानरूपी अलंकारका स्वामी है ऐसे सम्यग्दर्शनरूपी समोचीन रत्न को समस्त प्राणियोंने अपने कानों तथा हृदय में धारण किया ।११४ - ११५ ॥ काय, इन्द्रियां, गुणस्थान, जीवस्थान, कुल और आयुके भेद तथा योनियोंके नाना विकल्पोंका आगमरूपी चक्षुके द्वारा अच्छी तरह अवलोकन कर बैठने-उठने आदि क्रियाओंमें छह कायके जीवोंके वध - बन्धनादिकका त्याग करना प्रथम अहिंसा महाव्रत कहलाता है | ११६ - ११७॥ राग, द्वेष अथवा मोहके कारण दूसरोंके सन्ताप उत्पन्न करनेवाले जो वचन हैं उनसे निवृत्त होना सो द्वितीय सत्य महाव्रत है ॥ ११८ ॥ | बिना दिया हुआ परद्रव्य चाहे थोड़ा हो चाहे बहुत उसके ग्रहणका त्याग करना सो तृतीय अचौर्यं महाव्रत है ॥ ११२ ॥ कृत, कारित और अनुमोदनासे स्त्री-पुरुषका त्याग करना सो चतुर्थं ब्रह्मचर्यात कहा गया है ॥ १२०॥ परिग्रह के दोषोंसे सहित समस्त बाह्याभ्यन्तरवर्ती परिग्रहोंसे विरक्त होना सो पंचम अपरिग्रह महाव्रत है ॥ १२१ ॥ नेत्रगोचर जीवोंके समूहको बचाकर गमन करनेवाले मुनिके प्रथम ईर्यासमिति होती है । यह ईर्यासमिति व्रतोंमें शुद्धता उत्पन्न करनेवाली मानी गयी है ॥ १२२ ॥ सदा कर्कश और कठोर वचन छोड़कर यत्नपूर्वक प्रवृत्ति करने - वाले यतिका धर्मकार्योंमें बोलना भाषा समिति कहलाती है ।। १२३ ।। शरीरकी स्थिरताके लिए पिण्डशुद्धिपूर्वक मुनिका जो आहार ग्रहण करना है वह एषणा समिति कहलाती है ॥ १२४॥ देखकर योग्य वस्तुका रखना और उठाना सो आदाननिक्षेपण समिति है ॥ १२५ ॥ प्रासुक भूमि पर शरीर के भीतरका मल छोड़ना सो प्रतिष्ठापन समिति है ॥ १२६ ॥ इस प्रकार इन पाँच समितियोंका तथा मनोयोग, वचनयोग और काययोगको शुद्ध प्रवृत्तिरूप तीन गुप्तियोंका पालन करना चाहिए || १२७|| मन और इन्द्रियोंका वश करना, समता, वन्दना, स्तुति, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और कायोत्सर्गं इन छह आवश्यक क्रियाओंका पालन करना, केश लोंच करना, स्नान १. सर्वप्राणिसभूहैः । २. गच्छतः । Jain Education International २१ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001271
Book TitleHarivanshpuran
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages1017
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Story
File Size26 MB
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