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________________ देवागम विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ परमें दुःख-सुखसे पाप-पुण्यके स्यानिपातकी अर्थ-व्यवस्था ९७ एकान्तकी सदोषता ८५ स्याद्वादका स्वरूप ९८ स्वमें दुःख-सुखसे पुण्य-पापके स्याद्वाद और केवलज्ञानमें एकान्तकी सदोषता ८८ भेद-निर्देश उक्त उभय तथा अवक्तव्य नय-हेतुका लक्षण एकान्तोंकी सदोषता ९० द्रव्यका स्वरूप और भेदोंकी पूण्य-पापकी निर्दोष व्यवस्था ९० सूचना १०० अज्ञानसे बन्धका और अल्प- निरपेक्ष और सापेक्ष नयोंकी ज्ञानसे मोक्षका एकान्त ९३ स्थिति १०० उक्त उभय और अवक्तव्य वस्तुको विधि-वाक्यादि-द्वारा एकान्ताका सदाषता ९४ नियमित किया जाता है १०१ अज्ञान-अल्पज्ञानसे बन्ध-मोक्ष - तदतद्रूप वस्तुको तद्रूप ही कहनेकी निर्दोष-विधि ९४ वाली वाणी सत्य नहीं १०२ कर्मबन्धानुसार संसार विविधरूप और बद्ध जीव शुद्धि-अशुद्धिके तद्धिन्न-वाक्य अवस्तु १०३ भेदसे दो भेदरूप । अभिप्रेत-विशेषको प्राप्तिका शुद्धि-अशुद्धि दो शक्तियोंकी सादि-अनादि व्यक्ति ९५ सच्चा साधन . १०४ प्रमाणका लक्षण और उसके स्याद्वाद-संस्थिति भेद । ९६ आप्त-मोमांसाका उद्देश्य १०६ प्रमाणोंका फल ९६ अनुवादकीय-अन्त्य-मंगल ,, १०५ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.001170
Book TitleAptamimansa
Original Sutra AuthorSamantbhadracharya
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages190
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size9 MB
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