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________________ ४८८ ] [वर्ष ह धीमी रफ्तारसे होरहा है, उससे मुझे 'अनेकान्त' बनारससे प्रकाशित करनेकी तनिक भी हिम्मत नहीं होती ।" इसे पढ़कर हृदयमें उदित हुई आशापर फिरसे तुषारपात हो गया और मैं यही सोचने लगा कि यदि गोयलीयजीने प्रेसकी कोई समुचित व्यवस्था न की तो मुझे अब वीरसेवामन्दिरकी ओर से एक स्वतन्त्र प्रेस खड़ा करना ही होगा, जिसकी उसके तय्यार ग्रन्थों के प्रकाशनार्थ भी एक बहुत बड़ी ज़रूरत दरपेश है और इसलिये इस किरण में प्रेसकी व्यवस्था तक कुछ महीनोंके लिये अनेकान्तको बन्द रखनेकी सूचना कर देनी होगी । परन्तु 'पाठकोंको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि डालमियानगर से बनारस जानेपर गोयलीयजीका विचार बदल गया और उनमें मुनिकान्तिसागरजी आदिकी प्रेरणाको पाकर उस हिम्मतका संचार हो गया जिसे वे अपने में खोए हुए थे और इसलिये अब वे बनारस से 'अनेकान्त' को प्रकाशित करनेके लिये तत्पर होगये हैं; जैसा कि इसी किरणमें अन्यत्र प्रकाशित उनके 'प्रकाशकीय वक्तव्य' से प्रकट है। वक्तव्यके अनुसार अब 'अनेकान्त' बिलकुल ठीक समय पर निकला करेगा, सुन्दर तथा कलापूर्ण बनेगा, बहुश्रुत विद्वानोंसे लेखोंके माँगने के लिये मुँह खोलने में किसीको कोई संकोच नहीं होगा, जैनेतर विद्वानोंके लेखोंसे भी पत्र अलंकृत रहेगा और उनके लेखों को प्राप्त करनेमें आत्मग्लानि तथा हिचकचाटका कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होगा - ज्ञानपीठ उसके पीछे जो भी व्यय होगा उसे उठानेके लिये प्रस्तुत है । और इसलिये 'अनेकान्त' श्रागेको घाटेमें न चलकर दूसरे पत्रोंकी तरह लाभमें ही चलेगा, उसके हितैषियोंकी संख्या भी आवश्यकता से अधिक बढ़ जायगी और फिर गोयलीयजीको अपने विद्वानोंका "प्रेस जूतियाँ चटकाते फिरना" भी नहीं खटकेगा अथवा उसका अवसर ही न आएगा। संक्षेपमें अबतक जो कुछ कमी अथवा त्रुटि रही है वह सब पूरी की जायगी। इससे अधिक ग्राहकों तथा पाठकों आदिको और क्या आश्वासन चाहिये ? मुझे गोयलीयजीके इन दृढ सङ्कल्पोंको मालूम करके बड़ी प्रसन्नता हुई। हार्दिक भावना है कि उन्हें अपने इन सङ्कल्पोंको पूरा करने में पूर्ण सफलताकी प्राप्ति होवे और मुझे अपने प्रिय 'अनेकान्त' को अधिक उन्नत अवस्था में देखनेका शुभ अवसर मिले। अनेकान्त मैं इस वर्ष अपने सभी विद्वान लेखकों और सहायक सज्जनोंका आभार व्यक्त करता हुआ उन्हें हृदयसे धन्यवाद देता हूँ और इस वर्ष के सम्पादन- कार्यमें मुझसे जो कोई भूलें हुई हों अथवा सम्पादकीय कर्तव्य के अनुरोधवश किये गये मेरे किसी कार्य - व्यवहार से या स्वतन्त्र लेखसे किसी भाईको कुछ कष्ट पहुँचा हो तो उसके लिये मैं हृदयसे क्षमाप्रार्थी हूँ; क्योंकि मेरा लक्ष्य जानबूझकर किसीको भी व्यर्थ कष्ट पहुँचानेका नहीं रहा है और न सम्पादकीय कर्तव्य में उपेक्षा धारण करना ही मुझे कभी इष्ट रहा है। साथ ही, यह भी निवेदन कर देना चाहता हूँ कि अगले वर्ष मैं पाठकोंकी सेवामें कम ही उपस्थित हो सकूँगा; . क्योंकि अधिक परिश्रम तथा वृद्धावस्था के कारण मेरा स्वास्थ्य कुछ दिनोंसे बराबर गड़बड़में चल रहा है और मुझे काफ़ी विश्रामके लिये परामर्श दिया जा रहा है। वीरसेवामन्दिर, सरसावा, ता० २५ -३ - १६४६ जुगलकिशोर मुख्तार सर सेठ साहबका विवाहोत्सवपर अनुकरणीय दान अनेक पदविभूषित सर सेठ हुकुमचन्दजी इन्दौर के शुभ नामसे समाजका बच्चा २ परिचित है। राष्ट्र, समाज, और धर्मके क्षेत्रमें आपके द्वारा प्रारम्भसे ही अनेक उल्लेखनीय सेवाएँ हुई हैं और आज भी होरही हैं । समाजके आह्नानपर आप सदा उसकी सेवाके लिये आगे खड़े मिलते हैं। उनकी दानवीरता, विनम्रता और सहानुभूति तो अतुलनीय हैं । और इन्हीं गुणोंके कारण वे आजकी स्थिति में भी, जब पूँजी और अपूँजीका संघर्ष चालू है, Jain Education Internatio www.jainelibrary.org
SR No.527261
Book TitleAnekant 1948 11 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1948
Total Pages88
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size3 MB
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