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जिज्ञासा-समाधान ..
पं० रतनलाल बैनाड़ा.. प्रश्नकर्ता- जिनेन्द्र कुमार जैन 'एडवोकेट' दिल्ली । कल्प में पीत लेश्या में उत्पन्न हो सकते हैं? जिज्ञासा- 'भाण्ड' शब्द का क्या अर्थ होता है? इस संबंध मे निम्न प्रमाणों पर विचार करना उचित
समाधान- बाह्य परिग्रह के दस भेद कहे गए | है-१. राजवार्तिक ४/२२/१० में इस प्रकार कहा हैहैं-क्षेत्र-वास्तु, हिरण्य-स्वर्ण, धन-धान्य, दासी-दास, कुप्य | अर्थ- उत्कृष्ट शुक्ल लेश्यावाला आत्मा मरण
और भाण्ड। इनमें से भाण्ड शब्द का अर्थ इस प्रकार | करके सर्वार्थसिद्धि को प्राप्त होता है। मध्यम शुक्ल लेश्या समझना चाहिये
परिणामों से आनत स्वर्ग से लेकर सर्वार्थसिद्धि से पूर्व १. मूलाचार गा. ४०८ की टीका में कहा है- तक उत्पन्न होता है तथा जघन्य शुक्ल लेश्या से शुक्र, कपास आदि कुप्य कहलाते हैं और हींग, मिर्च आदि महाशुक्र, शतार और सहस्रार को जाता है। उत्कृष्ट पद्म को 'भाण्ड' कहते हैं।
लेश्या परिणामों से सहस्त्रार, मध्यम पद्म लेश्या से ब्रह्म २. संस्कृत-हिन्दी आप्टे कोष में भाण्ड का अर्थ | स्वर्ग से शतार तक तथा जघन्य पद्म लेश्या से सानत्कुमार इस प्रकार दिया है- पात्र, बर्तन, बासन (थाली, कटोरी, | तथा माहेन्द्र में उत्पन्न होता है। उत्कृष्ट पीत लेश्या से गिलास) औजार या उपकरण तथा मिर्च-मसाले आदि। सानत्कुमार-माहेन्द्रकल्प के चक्रेन्द्रक श्रेणी विमान तक,
उपर्युक्त प्रमाणों से भाण्ड शब्द का अर्थ विभिन्न मध्यम पीत लेश्या से चन्द्रादि तक तथा जघन्य पीत धातु एवं विभिन्न प्रकार के बर्तन, विविध प्रकार के लेश्या से सौधर्म-ऐशान स्वर्ग के प्रथम इन्द्रक श्रेणी विमान यंत्र तथा घर के काम में आनेवाले मसाले आदि लेने | तक उत्पन्न होता है। चाहिए।
भावार्थ- ११वें गुणस्थान में निर्ग्रन्थ मुनिराजों की जिज्ञासा- मुनियों के पाँच भेदों में जो निर्ग्रन्थ | उत्कृष्ट शुक्ल लेश्या होती है, अत: यदि वे ११वें गुणस्थान भेद है, उनका उपपाद पहले-दूसरे स्वर्ग तक कहा गया में मरण करते हैं, तो उनका जन्म सर्वार्थसिद्धि विमान है। निर्ग्रन्थों का गुणस्थान ११वाँ भी है। तो क्या ११वें | में होना चाहिये, ऐसा उपर्युक्त प्रमाण से स्पष्ट होता है। गुणस्थान वाले मुनि मरण करके सौधर्म-ऐशान स्वर्ग में | २. श्री धवला पु. २ पृ. ५५९ पर इस प्रकार उत्पन्न हो सकते हैं?
कहा हैसमाधान- आपका प्रश्न बहुत उचित है। निर्ग्रन्थ | प्रश्न- असंयत सम्यग्दृष्टि देवों के अपर्याप्त काल मुनिराजों का गुणस्थान ११वाँ एवं १२वाँ होता है। १२वें | में औपशमिक सम्यक्त्व कैसे पाया जाता है? गुणस्थानवर्ती मुनिराज तो उसी भव से मोक्ष पधारते ही उत्तर- वेदक सम्यक्त्व को उपशमाकर के और हैं, जबकि ११वें गुणस्थान वाले निर्ग्रन्थों का भवक्षय हो | उपशम श्रेणी में चढ़कर फिर वहाँ से उतरकर प्रमत्त जाने पर मरण भी संभव है। सर्वार्थसिद्धि ९/४७ की | संयत, अप्रमत्त संयत, असंयत और संयतासंयत उपशम टीका में उपपाद का वर्णन करते हुए आ. पूज्यपाद स्वामी सम्यग्दृष्टि गुणस्थानों से मध्यम तेजोलेश्या को परिणत ने कहा है कि
होकर और मरण करके सौधर्म-ऐशान कल्पवासी देवों 'सर्वेषामपि जघन्यः सौधर्मकल्पे द्विसागरोपमस्थितिषु' में उत्पन्न होनेवाले जीवों में अपर्याप्त काल में औपशमिक
अर्थ- इन सभी का (पुलाक से लेकर निर्ग्रन्थ | सम्यक्त्व पाया जाता है। तथा उपर्युक्त गुणस्थानवर्ती ही तक मुनियों का) जघन्य उपपाद सौधर्म कल्प में दो जीव (यथायोग्य उत्तरोत्तर विशुद्ध लेश्या से मरण करे सागरोपम की स्थिति वाले देवों में होता है। राजवार्तिक | तो) सानत्कुमार और माहेन्द्र, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तवमें भी इसी प्रकार कथन है।
कापिष्ठ, शुक्र-महाशुक्र, शतार-सहस्रार कल्पवासी देवों यहाँ विचारणीय विषय है कि क्या ११ वें गुण- | में उत्पन्न होते हैं। तथा उपशम श्रेणी पर चढ़कर के स्थान में उत्कृष्ट शुक्ललेश्या में मरण कर मुनिराज सौधर्म | और पुनः उतरकर के मध्यम शुक्ल लेश्या से परिणत
- अप्रैल 2009 जिनभाषित 29
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