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________________ प्रथमो लम्भः स्नेहप्रयोगमनपेक्ष्य दशां च पात्रं धुन्वंस्तमांसि सुजनापररत्नदीपः । मार्गपकाशनकृते यदि नामविष्यसन्मार्गगामि जनता खलु नाभविष्यत् ।।७।। त्यक्तानुवर्तनतिरस्करणौ प्रजानां श्रेयः परं च कुरुनोऽमृतकालकूटी। तद्वत्सदन्यमनुजावपि हि प्रकृत्या तम्मादपेक्ष्य किमुपेक्ष्य किमन्यमेति ।।८|| अथ मुजनं स्नानुमाह-स्नेहप्रयोगमिति--स्नेहप्रयोगं प्रीतिप्रयोगं पक्षे तैलप्रयोगम् । दशामवस्थी ५ पक्ष वनितम् । पागं शिष्यं पझे भाजनम् । अनपश्यापेक्षितमकृत्वा तमांसि अज्ञानानि पक्षे तिमिराणि धुन्धन नाशयन् सुजन एवापरस्त्रदीप इलि सुजनापसलदीपः सजनापरमणिमयदीपः । मार्गप्रकाशनकृत चिरन्तनकविमार्गप्रदर्शनाय यदि नाभविप्यहि स्लु नियूयेन सन्मागंगामिनी चासी जनता चेति सन्मार्गगामिजनता निदापमार्गगमनशीलो जनसमूहो नामविष्यत । हेतुहं तुमद्भावे लङ । यथा किल मणिमयी दीपस्तलप्रयोगं वर्तिका पात्रं चानप्रेक्ष्य स्वक्रीयप्रभाभारेण तिमिरं नाशयति तथा सुजनोऽपि १० म्नेहप्रयोगादिकमनपेक्ष्य सर्वेषामज्ञानतिमिरं नाशयतीति भावः ॥७॥ अथ सजनेन सह दुर्जनस्यापि निसर्ग वर्णग्रिनुमाह---त्यक्तति-अनुवर्तनं च तिरस्करण चेत्यनुवर्तनतिरस्करणे त्यक्त अनुवर्तनतिरस्करणे ययोस्ता यतानुवर्तनतिरस्करणी दुरीकृतसमादरतिरस्कारी । अमृतश्च कालकूटश्चेत्यमृतकालकूटी पीयूषगरलौ प्रजानां जनानाम् । श्रेयः कल्याणं परम् अकल्याणं च कुरुतो विधत्तः । यद्वदिति शेषः । तद्वत संश्च अन्यवेति मदन्यो, सो च तो मनुजी चेति सदस्यमनुजौ, सजनदुर्जनावपि त्यक्तानुवर्तनतिरस्करणौ सन्तौ १५ प्रकृया स्वभावेन श्रेयोऽश्रेयश्च कुम्तः । तस्मात किम् अपेक्ष्य, किम् उपेक्ष्य, अन्यं जनम् । एति प्राप्नोति जन इति शेषः। यथा किलामृग यनानुबानमपि लोकानां कल्याणमाकलयति कालकूटश्च त्यतिरस्करणोऽध्यकल्याणमाकलयति तथा सजनोऽपि स्यफानुवर्तनोऽपि जनानां हितमुत्पादयति दुर्जनश्च त्या निररकरणोऽयहित मुम्पादयति । अत पुत्र दुर्जनमुपेक्ष्य सज्जनस्यापेक्षणं प्यर्थमस्तीति भावः ॥ ८ ॥ 'सदा मेरे हृदयमें विद्यमान रहे ॥ ६ ॥ जो स्नेह प्रयोग-प्रीतिका प्रकृष्ट संयोग ( पक्षमें तेलका २० संयोग) दशा-अवस्था ( पक्षमें बत्ती) और पात्र-व्यक्ति ( पक्ष में भाजन ) की अपेक्षा न कर अजानान्धकारको नष्ट करता है ऐसा सज्जनरूपी श्रेष्ठ रत्नमय दीपक, मार्गको प्रकाशित करने के लिए यदि नहीं होता तो निश्चयसे जनता सन्मार्गमें गमन करनेवाली नहीं होती। भावार्थ-यहाँ कपकालंकार द्वारा सज्जनको रत्नमय दीपक बतलाते हुए कविने कहा है कि चकि सजन रूपी रत्नदीपक अन्य दीपकों के समान तेल बत्ती तथा पात्रकी अपेक्षा न रख २५ ( स्नेह अवस्था और व्यक्तिका होनाधिकताका विकल्प न कर ) सबको अज्ञान-तिमिरको दूर करता है इसीलिए जनता समीचीन मार्गपर च।।७।। जिस प्रकार अमृत और काल. कृट विप, आदर तथा तिरस्कार की अपेक्षा छोड़ क्रमसे प्रजाका कल्याण और अकल्याण करते हैं उसी प्रकार सज्जन और दुर्जन भी आदर और तिरस्कारकी अपेक्षा न कर प्रजाका कल्याण और अकल्याण करते हैं। अतः किसकी अपेक्षा कर और किसकी उपेक्षा कर ३. किस को प्राप्त होऊँ ? भावार्थ- अमृतका कोई आदर न करे तब भी वह लोगोंका कल्याण करता है और कालकूटका कोई तिरस्कार न करे, सन्मान करे तब भी वह लोगोंका अकल्याण ही करता है। इसी प्रकार सज्जनका कोई सत्कार न करे तब भी वह स्वभावसे ही दूसरोका कल्याण करता है और दर्जनका कोई तिरस्कार न करे, सन्मान करे तब भी वह स्वभावसे ही दसरोका अकल्याण करता है। ऐसी स्थिति में किसीकी अपेक्षा या उपेक्षा कैसी
SR No.090172
Book TitleGadyachintamani
Original Sutra AuthorVadibhsinhsuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1968
Total Pages495
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size20 MB
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