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________________ ( ८४ ) भावकुतूहलम् - [ स्त्रीसामुद्रिक: जिसकी ठोडी घनी, कोमल और रोमरहित हो तो शुभ होती है जिसमें रोम बहुत हों (टेढी) तिर्छा हो, छोटी अथवा बहुतमोटी हो तो शुभ नहीं, दुःख दौर्भाग्य दारिद्र्य करती है ॥ ७६ ॥ मांसल कोमलावेतौ कपोलौ वर्तुलाकृती । समुन्नतौ मृगाक्षीणां प्रशस्तौ भवतस्तदा ॥ ७७ ॥ जिन मृगाक्षियों के गाल बहुत मांसयुक्त, कोमल, गोलाकार ऊंचे हों तो शुभ होते हैं ॥ ७७ ॥ निर्मासौ पुरुषाकारौ रोमशौ कुटिलाकृती ॥ सीमंतिनीनामशुभौ दौर्भाग्यपरिवर्द्धकौ ॥७८॥ जिस नवयौवना स्त्रीके कपोल ( गाल ) मांसरहित हों, अथवा पुरुषकेसे हों तथा रोमयुक्त टेढी आकृतिके हों तो अशुभ होते हैं दौर्भाग्य ( कंबख्ती ) बढानेवाले होते हैं ॥ ७८ ॥ ओष्ठलक्षणम् । बर्तुलो रेखायाक्रांतो बन्धूकसदृशोऽधरः ॥ त्रिग्धो राजप्रियो नित्यं सुभ्रुवः परिकीर्तितः ॥७९॥ जिन सुभ्रुओंके होंठ गोल हों और रेखाओंसे युक्त तथा बंधूकपुष्पके समान रक्तवर्ण हों तथा स्निग्ध ( चिकने ) हों तो राजप्रिय अर्थात् ऐसे होंठ राजाको प्रिय होते हैं यह पूर्वाचार्योंने कहा ॥७९॥ प्रलंबः पुरुषाकारः स्फुटितो मांसवर्जितः ॥ दौर्भाग्यजनको ज्ञेयः कृष्णो वैधव्यसूचकः ॥ ८० ॥ जो ओष्ठ लंबा हो, पुरुषके सदृश हो, फटाहुआ हो तथा मांसरहित हो तो दौर्भाग्य देनेवाला जानना यदि ओष्ठ कृष्णरंगका होतो वैधव्य जनाता है ॥ ८० ॥ Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com
SR No.034482
Book TitleBhavkutuhalam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJivnath Shambhunath Maithil
PublisherGangavishnu Shreekrushnadas
Publication Year1931
Total Pages186
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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