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________________ षष्ठ वर्ग - पन्द्रहवाँ अध्ययन ] 161 } जहाँ भगवान गौतम थे उनके सम्मुख आई, भगवान गौतम को तीन बार आदक्षिणा प्रदक्षिणा करके वंदना की, नमस्कार किया। फिर विपुल अशन-पान खादिम और स्वादिम से प्रतिलाभ दिया यावत् विधिपूर्वक विसर्जित किया। सूत्र 4 मूल- तए णं से अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयम एवं वयासी-"कहि णं भंते ! तुब्भे परिवसह ?" तए णं भगवं गोयमे अइमुत्तं कुमारं एवं वयासी"एवं खलु देवाणुप्पिया ! मम धम्मायरिए धम्मोवएसए भगवं महावीरे आइगरे जाव संपाविउकामे, इहेव पोलासपुरस्स नयरस्स बहिया सिरिवणे उज्जाणे अहापडिरूवं उग्गहं उग्गिण्हित्ता संजमणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरइ, तत्थ णं अम्हे परिवसामो।" तए णं से अइमुत्ते कुमारे भगवं गोयमं एवं वयासी-"गच्छामि णं भंते ! अहं तुब्भेहिं सद्धिं समणं भगवं महावीरं पायदए?" "अहासुहं देवाणुप्पिया!"||4|| संस्कृत छाया- ततः खलु स: अतिमुक्त: कुमार: भगवन्तं गौतमम् एवमवदत्-“क्व नु भदन्त ! यूयं परिवसथ ?" ततः खलु भगवान् गौतम: अतिमुक्तं कुमार एवमवदत्-“एवं खलु देवानुप्रिय ! मम धर्माचार्यो धर्मोपदेशको भगवान् महावीर: आदिकर: यावत् संप्राप्तुकामः इहैव पौलासपुरात् नगरात् बहिः श्रीवने उद्याने यथाप्रतिरूपं अवग्रहमवगृह्य संयमेन तपसा आत्मानं भावमानः विहरति, तत्र खलु वयं परिवसामः।” ततः खलु स: अतिमुक्त: कुमार: भगवन्तं गौतमम् एवमवदत्“गच्छामि खलु भदन्त ! अहं युष्माभिः सार्धं श्रमणं भगवन्तं महावीर पादवन्दितुम्?” “यथासुखं देवानुप्रिय!''।।4।। अन्वयार्थ-तए णं से अइमुत्ते कुमारे भगवं = इसके बाद अतिमुक्त कुमार भगवान, गोयमं एवं वयासी- = गौतम से इस प्रकार बोले-, “कहि णं भंते ! तुब्भे परिवसह ?' = “हे देवानुप्रिय ! आप कहाँ रहते हैं ?', तए णं भगवं गोयमे अइमुत्तं = गौतम स्वामी ने इस पर अतिमुक्त, कुमारं एवं वयासी- = कुमार से कहा-, “एवं खलु देवाणुप्पिया ! मम = “हे देवानुप्रिय ! मेरे, धम्मायरिए धम्मोवएसए = धर्माचार्य धर्मोपदेशक, भगवं महावीरे आइगरे जाव संपाविउकामे, = धर्म के आदिकर यावत् मोक्ष के कामी भगवान महावीर, इहेव पोलासपुरस्स नयरस्स बहिया = इसी पोलासपुर नगर के
SR No.034358
Book TitleAntgada Dasanga Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHastimalji Aacharya
PublisherSamyaggyan Pracharak Mandal
Publication Year
Total Pages320
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_antkrutdasha
File Size2 MB
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