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________________ ११४ • अर्चयस्व हषीकेशं यदीच्छसि परं पदम् . [संक्षिप्त पापुराण करता है। इस पृथ्वीपर करोड़ों तीर्थ हैं। वे सब पर्यन्त वर्तमान जीवनके जितने भी पाप हैं, उन सबको तीनों सन्ध्याओंके समय पुष्करमें उपस्थित रहते हैं। पुष्करमें एक बार स्नान करके मनुष्य भस्म कर पिछले हजारों जन्मोंके तथा जन्मसे लेकर मृत्यु- डालता है। श्रीरामके द्वारा शम्बूकका वध और मरे हए ब्राह्मण-बालकको जीवनकी प्राप्ति पुलस्त्यजी बोले-राजन् ! पूर्वकालमें स्वयं तदनन्तर पुरोहित वसिष्ठजीने पाद्य, अर्घ्य और आचमनीय भगवान्ने जब रघुवंशमें अवतार लिया था तब वहाँ वे निवेदन करके उनका आतिथ्य-सत्कार किया। तत्पश्चात् श्रीराम-नामसे विख्यात हुए। तब उन्होंने लङ्कामें जाकर श्रीरामचन्द्रजीने जब उनसे कुशल-समाचार पूछा, तब वे रावणको मारा और देवताओंका कार्य किया था। इसके वेदवेत्ता महर्षि [महर्षि अगस्त्यको आगे करके] इस बाद जब वे वनसे लौटकर पृथ्वीके राज्यसिंहासनपर प्रकार बोले- 'महाबाहो! आपके प्रतापसे सर्वत्र स्थित हुए, उस समय उनके दरबारमें [अगस्त्य आदि] कुशल है। रघुनन्दन ! बड़े सौभाग्यकी बात है कि बहुत-से महात्मा ऋषि उपस्थित हुए। महर्षि शत्रुदलका संहार करके लौटे हुए आपको हमलोग अगस्त्यजीकी आज्ञासे द्वारपालने तुरंत जाकर महाराजको सकुशल देख रहे हैं। कुलघाती, पापी एवं दुरात्मा ऋषियोंके आगमनकी सूचना दी। सूर्यके समान तेजस्वी रावणने आपकी पत्नीको हर लिया था। वह उन्हीके तेजसे महर्षियोंको द्वारपर आया जान श्रीरामचन्द्रजीने द्वारपालसे मारा गया। आपने उसे युद्ध में मार डाला। रघुसिंह ! कहा-'तुम शीघ्र ही उन्हें भीतर ले आओ। आपने जैसा कर्म किया है, वैसा कर्म करनेवाला इस श्रीरामकी आज्ञासे द्वारपालने उन मुनियोंको सुख- संसारमें दूसरा कोई नहीं है । राजेन्द्र ! हम सब लोग यहाँ पूर्वक महलके भीतर पहुँचा दिया। उन्हें आया देख आपसे वार्तालाप करनेके लिये आये हैं। इस समय रघुनाथजी हाथ जोड़कर खड़े हो गये और उनके चरणों में आपका दर्शन करके हम पवित्र हो गये। आपके दर्शनसे प्रणाम करके उन्होंने उन सबको आसनोंपर बिठाया। हम वास्तवमें आज तपस्वी हुए हैं। आपने सबसे शत्रुता रखनेवाले रावणका वध करके हमारे आँसू पोंछे हैं और सब लोगोंको अभयदान दिया है। काकुत्स्थ ! आपके पराक्रमकी कोई थाह नहीं है। आपकी विजयसे वृद्धि हो रही है, यह बड़े आनन्दकी बात है। हमने आपका दर्शन और आपके साथ सम्भाषण कर लिया, अब हमलोग अपने-अपने आश्रमको जायेंगे। रघुनन्दन ! आप भविष्यमें कभी हमारे आश्रमपर भी आइयेगा।' पुलस्त्यजी कहते हैं-भीष्प ! ऐसा कहकर वे मुनि उसी समय अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने सोचा-"अहो! मुनि अगस्त्यने मेरे सामने जो यह प्रस्ताव रखा है कि 'रघुनन्दन ! फिर कभी मेरे आश्रमपर भी आना' तब अवश्य ही मुझे महर्षि अगस्त्यके यहाँ जाना चाहिये और देवताओंकी कोई गुप्त बात हो तो उसे सुनना चाहिये। अथवा यदि वे कोई दूसरा काम बताये तो उसे भी करना
SR No.034102
Book TitleSankshipta Padma Puran
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUnknown
PublisherUnknown
Publication Year
Total Pages1001
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size73 MB
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