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________________ 1468 नैषधमहाकाव्यम् / अध्वज पथपर्यटनजनितम् , श्रमं क्लान्तिम् , हरति नाशयति या सा ताहशी, भव. तीति शेषः / छायाबहुले मार्गे गतागतिं कुर्वाणानां पान्थानां पर्यटनक्लेशाननुभवा. दिति भावः / दमयन्याः कामस्त्वयि तव च दमयन्त्यामेव वर्तते, नान्यत्र कुनापीति तात्पर्यम् // 122 // ( हे राजन् ! ) इस ( दमयन्ती ) से आपको तथा आपसे इसको जाता ( प्राप्त होता) हुआ कामदेव ( गमनागमनजन्य ) श्रमको क्यों नहीं पावे ? ( पाठा०-पाता है ?) अर्थात् तुम दोनों मेंसे एकके पाससे दूसरेके पास जाता हुआ कामदेव अवश्य थक जाता है। अथवा (तुम दोनों में से एकके पाससे दूसरेके पास ) गमनागमन करते हुए इस कामदेवके मार्गजन्य श्रमको दूर करनेवाली आप दोनों की छाया ( परछाही, पक्षा०-शरीरकान्ति ) ही है। [ लोकमें मो छायामें गमनागमन करनेसे थकावट नहीं होती, अतः आप दोनोंकी छाया ही कामदेवके गमनागमनजन्य मार्गश्रमको दूर कर देती है / दमयन्तीमें आपका तथा आपमें दमयन्तीका काम है; ऐसा आपसमें स्नेह अन्यत्र कहीं भी नहीं देखा जाता ] // 122 // स्वेदप्लवप्रणयिनी तव रोमराजी रत्यै यदाचरति जागरितव्रतानि / आभासि तेन नरनाथ ! मधूत्थसान्द्रमग्नासमेषुशरकेशरदन्तुराङ्गः // 123 // स्वेदेति / नरनाथ ! हे मनुजाधिप ! नल ! स्वेदः धर्मजलम् , तत्र प्लवे स्नाने, प्रणयः प्रीतिः अस्या अस्तीति सा तादृशी, तव भवतः, रोमराजिः रोमसमूहः, रत्यै सुरताय, जागरितानि जागरणान्येव, उद्गमा एव च, व्रतानि नियमान् , यत् आचरति अनुतिष्ठति, पुष्पवती कामिनी यथा शुद्धस्नाता पतिसन्तोषार्थ जागरि. तानि आचरति तद्वदिति भावः / तेन व्रताचरणेन हेतुना, मधुनः क्षौद्रस्य, शरात्मककुसुमसारस्य इत्यर्थः / उत्थेन उद्गमेन / 'सुपि स्थः' इत्यत्र योगविभागात् भावे कप्रत्यये ततः समासः / सान्द्राः गाढाः, मिश्रणेन हेतुना घनीभूता इत्यर्थः। तथा मग्नाः भवदङ्गे अन्तःप्रविष्टाश्च, असमेषोः अयुग्मशरस्य कामस्य, शराणां बाणानाम्, कुसुममयानामिति भावः / केशरैः किमस्कः, दन्तुराणि निम्नोन्नतानि, अङ्गानि अवयवाः यस्य सः तादृशः इव, आभासि प्रतीयसे / भैमीसङ्गात् साविकभावोदयेन रोमाञ्चितशरीरः स्वेदयुक्तश्वासि इति निष्कर्षः // 123 // हे नरनाथ ! ( सात्त्विक भावजन्य ) स्वेदजलसे (या-स्वेदजलमें ) स्नानकरनेवाली तुम्हारी रोमराजि रतिके लिए जो जागरण व्रतोंको करती है अर्थात् तुम्हे जो रोमाञ्च हो जाता है, उससे पुष्परससे पूर्ण सघन मग्न (शरीर के भीतर घुसे ) हुए कामदेव बाणभूत पुष्पके किञ्जल्क ( पक्षा०-बाणों के पुच्छस्थ पङ्खरोम ) से दन्तुरित (उच्चावच ) अङ्गोवाले तुम शोमते हो / ( पक्षा०-रोमराजीरूपिणी दूती रतिके लिए तीर्थादि में स्नानकर जो जागरण व्रत करती है, उससे शरीरमें पूर्णतः प्रविष्ट हुए कामबाणों के पुच्छके पलोंके ऊपर दृश्यमान रोमोंसे युक्त शरीरवालेके समान तुम शोभते हो अथवा-रोमराजीरूपिणी स्त्री
SR No.032782
Book TitleNaishadh Mahakavyam Uttararddham
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas Shastri
PublisherChaukhambha Sanskrit Series Office
Publication Year1997
Total Pages922
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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