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________________ श्री थावच्चा रुषिराज सज्झाय. २३७ मोख पुवार ॥ १७ ॥ ज० ॥ देपु जणे श्री साधुना । रंगे गुण गाय ॥ रात दिवस सेवा करें । ते शिवपुरि जाय ॥ १ए ॥ ज० ॥ ॥ श्रीथावच्चा ऋषिराज स्वाध्याय ॥ (राग मारु. वीरजिणंद समोसर्याजी, वैदे०) नयरि द्वारिका थान अपूरव । कृष्णराय नर नाथ ॥ कुमर थावच्चो वसे गृहपति । कीधो मुगति सुं साथ ॥१॥ माइ हुं लेस्युं संयम नार । नव वि. रतो देखि कुमार ॥ आंकणी ॥ सुख संपति एवमा संजोगें । श्वा जोगवि सात ॥ बत्रीस अंतेजरी सुरपति ऋछि जिम । कां कहे व ! ए वात ॥ २॥ पूत्र मेरा जीवन जग आधार । माहरो किणे बोलव्यो रे कुमार ॥ पूत्र मेरा जीवन जग आधार ॥ आंकणी ॥ एक दिवस चित्रसाले बेठा । व्याहे रम्या नर मार ॥ अन्य दिवसे ते मृत्यु पहुतो। किम रहिये तुम्ह बार ॥ ३ ॥ मा० एम कां बोले माहरा जाया । रुदन करे तसु माइ ॥ निसि तसु नीद
SR No.032735
Book TitleSazzay Sangraha Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarchandrasuri
PublisherGokaldas Mangadas Shah
Publication Year1922
Total Pages264
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size17 MB
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