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________________ प्राणियों के प्रति अपने जैसा व्यवहार करता है वही स्वर्ग के सुखों को प्राप्त करता है। 1 जो व्यवहार स्वयं को प्रिय लगता है वैसा ही व्यवहार दूसरों के प्रति किया जाय । हे युधिष्ठिर, धर्म और अधर्म की पहचान का यही लक्षण है 12 पाश्चात्य दृष्टिकोण पाश्चात्य चिन्तन में भी सामाजिक जीवन में दूसरों के प्रति व्यवहार करने का यह दृष्टिकोण स्वीकृत है कि जैसा व्यवहार तुम अपने लिए चाहते हो वैसा ही दूसरे के लिए करो। कांट ने भी कहा है कि केवल उसी नियम के अनुसार काम करो जिसे तुम एक सार्वभौम नियम बन जाने की इच्छा करते हो। मानवता, चाहे वह तुम्हारे अन्दर हो या किसी अन्य के, सदैव साध्य बनी रहे, साधन कभी न हो कांट के इस कथन का आशय भी यही है कि नैतिक जीवन के संदर्भ में सभी को अपने समान मानकर व्यवहार करना चाहिए । ६. शुभ और अशुभ से शुद्ध की ओर जैन दृष्टिकोण जैन विचारणा में शुभ-अशुभ अथवा मंगल-अमंगल की वास्तविकता स्वीकार की गयी है । उत्तराध्ययनसूत्र के अनुसर तत्त्व नौ हैं जिसमें पुण्य और पाप स्वतंत्र तत्व हैं 34 तत्वार्थसूत्रकार उमास्वाति ने जीव, अजीव, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष ये सात तत्त्व गिनाये हैं, इनमें पुण्य और पाप को नहीं गिनाया है । 35 लेकिन यह विवाद महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि जो परम्परा उन्हें स्वतंत्र तत्व नहीं मानती है वह भी उसको आस्रव तत्त्व के अन्तर्गत मान लेती है । यद्यपि पुण्य और पाप मात्र आस्रव नहीं है, वरन् उनका बंध भी होता है और विपाक भी होता है । अतः आस्रव के शुभास्रव और अशुभास्रव ये दो विभाग करने से काम नहीं बनता, बल्कि बंध और विपाक में भी दो-दो भेद करने होंगे । इस कठिनाई से बचने के लिए ही पाप एवं पुण्य को स्वतंत्र तत्वों के रूप में गिन लिया गया है । 1 कर्म का अशुभत्व शुभत्व एवं शुद्धत्व [61]
SR No.032591
Book TitleJain Bauddh Aur Gita Me Karm Siddhant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSagarmal Jain
PublisherPrakrit Bharati Academy
Publication Year2016
Total Pages146
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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