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________________ बंधनकरण उत्तर-कंडकवर्ग और कंडकप्रमाण होत हैं । इसी तरह पूर्वोक्त प्रकार से दो अन्तरित, तीन अन्तरित और चार अन्तरित अनुभागबंधस्थानों की मार्गणा भी अपनी बुद्धि से कर लेना चाहिये । इस प्रकार अधस्तनस्थानों की प्ररूपणा जानना चाहिये ।' अब क्रमप्राप्त वृद्धिप्ररूपणा की जाती है-- वृद्धिप्ररूपणा वुड्ढी हाणी छक्कं, तम्हा दोणं पि अंतमिल्लाणं । अंतोमुत्तमावलि असंखभागो उ सेसाणं ॥३८॥ शब्दार्थ-वुड्ढी हाणी छक्क-छह प्रकार की वृद्धि और हानि होती हैं, तम्हा-इसलिये, दोण्हं पिदोनों (हानि और वृद्धि) भी, अंतमिल्लाणं-अन्त की, अंतोमुहत्तं-अन्तर्मुहूर्त की, आवलि-आवलि के, असंखभागो-असंख्यातवें भाग प्रमाण, उ-और, सेसाणं-शेष. की। ___ गाथार्थ-छह प्रकार की वृद्धि और छह प्रकार की हानि अनुभागवंधस्थान में होती है। इसलिये उनके समय का कथन करते हैं कि इनमें से अंतिम दोनों अर्थात् अंतिम वृद्धि और अंतिम हानि का (उत्कृष्ट) काल अन्तर्मुहूर्त है और शेष पांचों वृद्धि और हानियों का (उत्कृष्ट) काल आवलिका के असंख्यातवें भाग प्रमाण है । विशेषार्थ-इस संसार में जीव अपनी परिणतिविशेष से कर्म परमाणुओं में अनुभाग की उपर्युक्त स्वरूप वाली छह प्रकार की वृद्धि और हानि को करते रहते हैं । इसलिये कौनसी वृद्धि और हानि को जीव कितने काल तक करते रहते हैं ? यह जानने के लिये अवश्य ही काल का प्रमाण कहना चाहिये । उन छह वृद्धि और हानियों में अंतिम दो का अर्थात् अनन्तगुणवृद्धि और अनन्तगुणहानि का काल अन्तर्मुहूर्त जानना चाहिये। इसका अर्थ यह है कि अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव निरंतर अपने परिणामविशेष से प्रतिसमय पूर्व-पूर्व अनुभागबंधस्थान की अपेक्षा उत्तरउत्तर अनुभागबंधस्थानों को अनन्तगुणी वृद्धि रूप से अथवा अनन्तगुणी हानि रूप से बांधते हैं तथा शेष अर्थात् आदि की पांच वृद्धियों' का और पांच हानियों का काल आवलिका का १. अधस्तनस्थानप्ररूपणा का विशेष स्पष्टीकरण परिशिष्ट में देखिये । ........ २. विवक्षित समय में जीव जिस अनुभागाध्यवसायस्थान में है उससे दूसरे समय में अनन्त गुणाधिक अध्यवसायस्थान में, उससे तीसरे समय में अनन्तगुणाधिक अध्यवसायस्थान में हो, इस प्रकार अन्तर्मुहर्त तक निरन्तर अनन्तगणाधिक रूप से बढ़ते-बढ़ते हुए अध्ययसाय में रहे, वह अन्तर्महूर्त काल प्रमाण की अनन्तगुणवृद्धि जानना चाहिये । इसी प्रकार अनन्तगुणहानि भी समझ लेना चाहिये । ३. आदि की पांच वृद्धियां इस प्रकार हैं-(१) अनन्तभाग वृद्धि (२) असंख्यभाग वृद्धि (३) संख्यभाग वृद्धि, (४) संख्यगुण वृद्धि, (५)असंख्यगुण वृद्धि । ४. आदि की पांच हानियों के नाम इस प्रकार हैं-(१) अनन्तभागहानि, (२) असंख्यातभागहानि, (३) संख्य भागहानि, (४) संख्यगुणहानि, (५) असंख्यगुणहानि ।
SR No.032437
Book TitleKarm Prakruti Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year1982
Total Pages362
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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