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________________ [ १२८ ] केवल वर पाया, चामरादि धराया। सेवे सुरराया, मोक्षनगरे सधाया ॥१॥ . (७) श्री सुपार्श्वनाथ जिन स्तुति सुपास जिन वाणी, सांभले जेह प्राणी। हृदये पहेचाणी, ते तर्या भव्य प्राणी ॥ पांत्रीस गुण खाणी, सूत्रमा जे गुंथाणी। षट् द्रव्यशुं जाणी, कर्म पीले ज्युं धाणी ॥१॥ (८) श्री चंदप्रभ जिन स्तुति सेवे सुर वृदा, जास चरणारविदा; अठुम जिनचंदा, चंद वरणे सोहंदा ; महसेन नृपनंदा, कापता दुःख दंदा ; लंछन मिष चंदा, पाय मानु सेवंदा ।। १ __(8) श्री सुविधिनाथ जिन स्तुति नरदेव भाव देवो,, जेहनी सारे सेवो । जेह देवाधिदेवो, सार जगमां ज्युं भेवो ।। जोतां जग एहबो, देव दीठो न तेहवो । सुविधि-जिन जेहवो, मोक्ष दे ततखेवो ॥१॥ (१०) श्री शीतलनाथ जिन स्तुति शीतल-जिन स्वामी; पुण्यथी सेव बामी। प्रभु आतमरामी, सर्व परभाव वामी ॥ जे शिवगति गाभी, शाश्वतानंद-धामी। भवी शिवसुख कामी, प्रणमिये शीश नाभी ॥१॥
SR No.032198
Book TitlePrachin Stavan Jyoti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivya Darshan Prakashan
PublisherDivya Darshan Prakashan
Publication Year
Total Pages166
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size15 MB
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