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________________ १० जयणदिविरइयउ [७. १८. १४पियइ पियअहरु महुयरु व कमलिणिरसं॥ कहिँ मि क वि रमणि तहिँ लहिवि पियफरिसणं । बहलहुयपुलय परिहरइ मणे रणरणं ॥ कहिँ मि मणिकडय तणुघडण णिवडिय जले। सहहिँ पडिफुरिय ससहररवि व णयले ॥ ॥ छंदु दिणमणि इमो॥ घत्ता-जलकील करेवि सरवराउ णिग्गउ जणु । तो तरुणिहिँ जुत्तु अभय पसाहइ णियतणु ॥ १८ ॥ १६. णिडालएसे लिहिओ विचित्तओ दुरेहु जाईकलियान सत्तओ। कवोलवटे मयणाहिवल्लिया विलेहिया चूयसुमंजरिल्लिया ॥ सत्थ ॥ तेयवंत किय कण्णहिँ कुंडल राहुभएण चंदरविमंडल । णं सरणy पइट्ठ मिगणयणहे णहमणिकिरणुज्जोइयगयणहे ॥ सिहिणहँ उवरि हारु परिघोलइ णहगंगापवाहु णं लोलइ। अह णं कामपासु भावालउ अह णं महुसिरीहिँ हिंदोलउ ॥ थड्ढहं पुरउ लुठंतु णवंतु वि मज्भासण लहइ गुणवंतु वि। मेहलान जं हुयवहु सेविउ तेणं तहिं णियंबु संपाविउ ॥ रणझणंतु हंसउलइँ तोसइ मंजीरयहँ जुयलु णं घोसइ । कुंकुमलित्तु चलणजुयलुल्लउ मइँ दुलहउ वि लधु णिरु भल्लउ॥ १० घत्ता-अहा सेणियराय किं बहुणा मोहियसुरे । सयलु वि संतुहु जणं गउ णयणंदिउ पुरे ॥ १९ ॥ एत्थ सुदंसणचरिए पंचणमोकारफलपयासयरे माणिकणंदितइविजसीसणयणंदिणा रइए सुदंसणविलासया कविलबभणीछम्मणं वसंतसमयागमे जिह पइण-संबंधयं वणम्मि जलकीलणं अभयादेवितणुभूसणं इमाण कयवण्णणो भणिो संधि फुड सत्तमो"। संधि ॥७॥ १८. ५ क रइगणं। १६ १ ग घ कलियापसत्तो । २ घ थट्टह। ३ ख मज्झाउं वि। ४ कलिल्लु; ख लीड। ५ ग घ दुलधु लद्धउ। ६ ख जगु । ७ क पुरवरे । ८ ख छम्म । ९ ख पयज। १० क समत्तो ।
SR No.032196
Book TitleSudansan Chariu
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNayanandi Muni, Hiralal Jain
PublisherResearch Institute of Prakrit Jainology and Ahimsa
Publication Year1970
Total Pages372
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size28 MB
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