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________________ 36 भट्टारक थकी, लोक करे जुहार; बेने भाई जीमाडियां, नंदीवर्धन सार. ८ भाई बीज तिहां थकी, वीरतणो अधिकार; जय विजय गुरु संपदा, मेरु दिओ मनोहार. ६ (90) ज्ञान उज्वल दिवाकरो, मेरईयां संचिय, तप जप सेव सुंहाळीयां, श्रद्धा अमृत ठाय. १ शुद्धाहार सुख भक्षिका, सत्य वयण तंबोल; शील आभूषण पहेरीये, करीये रंग रोळ. २ निद्रा अलच्छी दूर करो, मोह महाभट मारो; केवल लक्ष्मी लच्छी लावीओ, निज गेह समारो ३ दानादिक स्वस्तिक करो, साधर्मिक सयणां; इम दिवाळी कीजीओ, सुणीये श्री गुरु वयणां. ४ दिवाळी दिन अहीज भलो ओ, वीर प्रभु निर्वाण, जाणी नित्य आराधतां, पद्म कहे कल्याण. ५ (91) जय जय श्री जिन वर्धमान, सोवन समकाय, सिंह लंछन सिद्धार्थराय, त्रिशला सुत भाण. १ वरस बहोंतर आयुं देह, कर सत्त प्रमाण; ऋषभादिक सम जास वंश, इक्ष्वाकु सम जान. २ छठ्ठ भत्त संजम लीओ ओ, कुंडल ग्राम शुभ ठाम; गणधर अगीयारे सहित, आवो शिवपुर स्वाम. ३ चौदह सहस मुनि, शिष्य छत्रीस सहस; श्रमणी श्रावक ओक लाख, गुण सट्ठ सहस. ४ तीन लाख श्राविका वली, अधिक सहस अढार; सुर मातंग सिद्धायिका, नीत सानिध्य कार. ५ ओकाकी पावापुरी अ, छट्ठ भक्त सुजाण; प्रभु पहोता अमृत पदे, करो संघ कल्याण. ६ (92) श्री पर्युषण पर्वना चैत्यवंदनो सकल पर्व शृंगार हार, पर्युषण कहीओ; मंत्र मांही नवकार मंत्र, महिमा जग लहीओ. १ आठ दिवस अमारी सार, अट्ठाई पालो; आरंभादिक परिहरि; नरभव अजुआलो. २ चैत्य परिपाटी शुद्ध साधु, विधि वंदन जावे; अठ्ठम तप संवच्छ, पडिक्कमणुं भावे. ३ साधर्मिक जन खामणां अ, त्रिविधे शुं कीजे; साधु मुख सिद्धांत कांत, वचनामृत रस पीजे. ४ नव व्याख्याने कल्प सूत्र, विधि पूर्वक सुणीओ. पूजा नव प्रभावना, निज पातिक हणीों. ५ प्रथम वीर
SR No.032195
Book TitlePrachin Chaityavandan Stuti Stavan Parvtithi Dhalo
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDinmanishreeji
PublisherDhanesh Pukhrajji Sakaria
Publication Year2001
Total Pages634
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size14 MB
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