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________________ शीतल आहाराऽधिकारः ३५६ कह्यो । ने तो अत्यन्त नीरस ठण्डो स्वाद रहित. वणीमग रांक बांछे नहिं ते लेणो को । अनें ठण्डा में जीव हुवे तो किम लेवे । डाहा हुवे तो विचारि जोइजो । इति ३ बोल सम्पूर्ण । तथा प्रश्न व्याकरण अ० १० में कह्यो । ते पाठ लिखिये छै । पुरवि जिभिंदिएण साइयरसाई अमरगुरण पावगाइ किंते रस विरस सी लुक्ख निजप्प पाण भोयणाई दोसीय वावरण कुहिय पूहिय अमरण विराट सुय २ बहु दुभिंगंधाइ तित्तकडु कसाय अविल रस लिंट नी रसाइ सुय एव माइएस अमरण पावएस तेसु समणेा रू सियव्वं जाव चरेज धम्मं ॥ १८ ॥ ( प्रश्नव्याकरण अ० १०) उ० चली. जि० जिह्वा इन्द्रिये करी. सा० अस्वादीय रस. ० श्रमनोश पा० पाहुनारस अस्वादो चारित्रया नें द्वेष न आणिवो कि० ते केहनो अ० गुललचणादिक लूखौ चार रहित रस रहित वि० पुराना भाषे करी विगतरस. सी० ताढ़ा जेह थकी शरीर नी याप मी न थाइ एतावता निर्बल रस. भोजन तथा एहवा. पाणी नें दो० वासी अन्नादिक. व० वनिष्ट कं० कह्यो ५० अपवित्र अत्यन्त कुद्यो अ० अमनोज्ञ वि० विणठारस. ब० घणा दु० दुर्गन्ध ति० नोब सरीखो. क० सूंठ मिरच सरीखो. क० कषायलो बहेड़ा सरीखो. अ० विल रस तक्र सरीखो. लि० शैवाल सरीखो नी० पुरातन पाणी सरीखी. नीरस रस सहित एहवी रस श्रास्वाद द्वेष न प्राणिवो अ० अनेरा इत्यादिक रसने विषे. अ० अमनोश. पा० पाडुआ. तेहने विषे. ० रिवो नहीं जा० इत्यादिक पूर्ववत् चे० धर्म चारित्र लक्षण रूप निरतिचार प०ये, चौथी भावना कही.
SR No.032041
Book TitleBhram Vidhvansanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayacharya
PublisherIsarchand Bikaner
Publication Year1924
Total Pages524
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size40 MB
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