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________________ चउदह जीव-समास मुणंतउ पण्णारह पमाय मारंतउ कव्वड-खेड-मडंवारामइँ पट्टणपुर णयराइँ भमंतउ चउदह गुणठाण-वियार कुणतउ ।। सोलहविह कसाय विरंतउ।। दोणामुह-संवाहण-गामइँ।। विहरंतउ भीमावइ पत्तउ।। पत्ता- जहिँ णउलोरय संगरु करहिं वणवासिय-विंतर-मणुहरहिँ। गिरिवर समाण गंडय चलहिँ अवरोप्परु वाणर किलिकिलहिँ।। 115।। 20 7/2 PārŚwa-Muni sits for meditation in Kāyotsarga Mudrā (stand still form) on a tattered rock situated in a corner of the Bhīmātawi full of various wild animals and trees. वत्थु-छन्द-जहिँ गयाहिव भमहिँ मच्चंत। जहिँ हरिण फालइँ करहिँ जहिँ मयारि मारंति कुंजरं। जहिं तरणि किरणोसरहिं जहिँ सरोस घुरुहरहिँ मंजरं।। जहिँ सरि-तीरुब्भव बहल कद्दमरस लोलिहिँ। जुज्झिज्जइ सिसु ससि-सरिस दिढ-दाढहिँ कीलिहिँ।। छ।। जहिँ हिंताल-ताल-तालूरइँ साल-सरल-तमाल-मालूर।। अंब-कयंब-णिंब-जंबीरइँ चंपय-कंचणार-कणवीरइँ।। टउह-कउह-बब्बूल-लवंग जंबू-माउलिंग-णारंग:।। जीव समासों एवं गणस्थानों का मनन-विचार करते हए, पन्द्रह प्रकार के प्रमादों को मारते हुए, सोलह प्रकार की i का निवारण करते हुए, कर्वट, खेड, मडम्ब, आराम, द्रोण, मुख, संवाहन, ग्राम, पट्टन, पुर एवं नगरों आदि का भ्रमण करते हुए, अपने विहार के क्रम में वे प्रभु उस भीमाटवी में पहुँचे जहाँघत्ता- नेवले एवं सर्प लड़ते रहते थे, वनवासी (आदिवासी जंगली) लोग व्यन्तरों के मन का हरण करते थे, जहाँ पर्वत के समान शरीर वाले गेंडे घूमते रहते थे और जहाँ वानरगण परस्पर में क्रीड़ाएँ करते रहते थे। (115) 7/2 विविध जंगली जानवरों से युक्त तथा विभिन्न वृक्षावलियों से सुशोभित भीमाटवी-वन की एक खुरदरी शिला पर पार्व मुनि कायोत्सर्ग-मुद्रा में ध्यानस्थ हो गयेवस्तु-छन्द—जहाँ (जिस भीमाटवी-वन में) उछलते कूदते हुए गजाधिप घूम रहे थे, जहाँ हिरण चौकड़ियाँ भरकर उछल कूद कर रहे थे, जहाँ सिंह गजों को मार रहे थे, जहाँ सूर्य की किरणें (उन्नत घने वृक्षों के कारण) अवरुद्ध हो जाती थीं, जहाँ मार्जार (वन-विलाव) रोषपूर्वक घुरघुरा रहे थे, जहाँ के सरोवरों के तटों पर उत्पन्न अत्यधिक कर्दम-(कीचड) रस में चपलता पूर्वक खेलते हुए चन्द्रमा के समान शुभ्र दाढों वाले शूकर अपने बच्चों के साथ क्रीडाएँ कर रहे थे। जहाँ हिंताल, ताल, तालूर, सरल सीधे साल, तमाल (अशोक), मालूर (देवदारु), आम्र, कदम्ब, निम्ब, जम्भीर, चम्पक, कचनार, कणवीर, (कनेर) टउह, कउह (अर्जुन), बबूल, लवंग, जम्बू, मातुलिंग (बिजौरा), नारंगी, अरलू, पासणाहचरिउ :: 135
SR No.023248
Book TitlePasnah Chariu
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajaram Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2006
Total Pages406
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size35 MB
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