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________________ ३५२ * पार्श्वनाथ चरित्र दाने दिये पांच वर्ष व्यतीत होने चले, अतएव अब देखना चाहिये, कि उन्होंने उनका क्या किया ? यह सोचकर उसने फिर पूर्ववत् अनेक स्वजनोंको इकट्ठे किये और उन्हें भोजनादि द्वारा सम्मानित करनेके बाद उनके सामने ही बहुओंसे वे दाने मांगे। पहले उसने बड़ी बहूसे कहा,—“हे वत्से ! क्या तुझे स्मरण है कि मैंने पांच वर्ष पर तुझे ब्रोहिके पांच दाने दिये थे ?” यह सुन उसने कहा,—“हां, मुझे अच्छी तरह स्मरण है।” दत्तने कहा-“अच्छा, तो वे दाने मुझे इसी समय ला दो । ससुरको यह बात सुनकर उज्झिता घरमें गयो और वहांसे दूसरे पांच दाने लाकर श्वसुरके हाथ में रख दिये। श्वसुरने पूछा, “हे वत्से ! ये वही दाने हैं या दूसरे ?” उज्झिता कुलवधु थी अतएव उसने झूठ बोलना उचित न समझ कर कहा, “यह दाने वही नहीं, बल्कि दूसरे हैं । यह सुन श्वसुरने फिर पूछा,-“तूने मुझे दूसरे दाने क्यों दिये ?” बहूने कहा,-"पिताजी ! क्षमा कीजिये । मैंने उन्हें निरर्थक समझ कर उसी समय फेंक दिया था। उसकी यह बात सुनकर श्वसुरने क्रुद्ध होकर कहा,-- "दानानुसाराणो कीर्ति लक्ष्मोः पुण्यानुसाराणी । प्रज्ञानुसाराणी विद्या, बुद्धिः कर्मानुसाराणो॥" अर्थात्-“दानके अनुसार कीर्ति, पुण्यके अनुसार लक्ष्मी, बुद्धिके अनुसार विद्या और कर्मानुसार बुद्धि होती है।" यह कहते हुए उसने उज्झिताको घर झाड़ने-बटोरने आदिका काम
SR No.023182
Book TitleParshwanath Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKashinath Jain Pt
PublisherKashinath Jain Pt
Publication Year1929
Total Pages608
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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