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________________ आचारांग के प्रथम अध्ययन में पृथ्वीकायिक आदि स्थावर जीवों में चेतना शक्ति का निरूपण करते हुए कहा गया है कि उन्हें सुख-दुःख आदि वेदना की अनुभूति होती है। भगवतीसूत्र में भी स्थावर जीवों के आहार, श्वास, वेदना आदि की विस्तार से चर्चा की गई है। मुक्तात्मा का स्वरूप बताते हुए आचारांग' में उसे परिज्ञ, संज्ञ, अनुपमेय, शरीर-रहित व अपदस्त कहा है। भगवतीसूत्र में सिद्धस्वरूप को द्रव्य, क्षेत्र, काल व भाव की दृष्टि से स्पष्ट किया गया है। भगवतीसूत्र व सूत्रकृतांग सूत्रकृतांग एक दार्शनिक ग्रंथ है, जिसमें भगवान् महावीर के समय प्रचलित विभिन्न दार्शनिक मतों का विश्लेषण है। सूत्रकृतांग के 12वें 'समवसरण' नामक अध्ययन में क्रियावादी, अक्रियावादी, विनयवादी व अज्ञानवादी इन चार समवसरणों का वर्णन हुआ है। इसमें एकांत क्रियावाद व एकांत ज्ञानवाद से मुक्ति नहीं मानी गई है, किन्तु ज्ञान व क्रिया के समन्वय से मुक्ति मानी गई है। भगवतीसूत्र में 'समवसरण' नामक उद्देशक में इन चारों दार्शनिक मतों का उल्लेख हुआ है। ज्ञान व क्रिया के संबंध को स्पष्ट करते हुए भगवतीसूत्र में कहा गया है कि जो व्यक्ति शीलवान भी है व श्रुतसम्पन्न भी है वही सच्चा आराधक है। सूत्रकृतांग के छठे अध्ययन 'आर्द्रकीय' में आजीविकमत के आचार्य गोशालक, बौद्ध भिक्षु, वेदान्त दर्शन को मानने वाले ब्राह्मण परिव्राजक और हस्तितापस के उल्लेख मिलते हैं। इस दृष्टि से सूत्रकृतांग व भगवतीसूत्र में गहरा संबंध है। आजीविक मत का जितना विस्तृत विवेचन भगवतीसूत्र में मिलता है अन्यत्र नहीं। इसके अतिरिक्त परिव्राजक, हस्तितापस व अन्यतीर्थिक मान्यताओं के वर्णन भी इस ग्रंथ में हुए हैं । सूत्रकृतांग12 में पेढ़ालपुत्र उदकश्रमण द्वारा भगवान् महावीर के पास चातुर्याम धर्म से पंचमहाव्रत धर्म को स्वीकार करने का उदाहरण मिलता है। भगवतीसूत्र में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ पार्श्वपरम्परा के अनगारों ने महावीर से तत्त्वचर्चा करने के पश्चात् चातुर्याम धर्म के स्थान पर पंचमहाव्रत रूप धर्म को स्वीकार किया है। सूत्रकृतांग13 में लोक का स्वरूप बताते हुए उसे अनंत, अन्तरहित, नित्य, नाशरहित व शाश्वत रूप कहा गया है। भगवतीसूत्र14 में भी लोकस्वरूप इसी प्रकार वर्णित है। सूत्रकृतांग के द्वितीय श्रुतस्कंध के चतुर्थ प्रत्याख्यान' नामक अध्ययन में अप्रत्याख्यान को कर्मों का मूल तथा प्रत्याख्यान को कर्ममक्ति का मार्ग बताया गया है। भगवतीसूत्र15 में सुप्रत्याख्यानी और दुष्प्रत्याख्यानी के स्वरूप पर विवेचन मिलता है। 20 भगवतीसूत्र का दार्शनिक परिशीलन
SR No.023140
Book TitleBhagwati Sutra Ka Darshanik Parishilan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTara Daga
PublisherPrakrit Bharti Academy
Publication Year2012
Total Pages340
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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