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________________ हि. वे शक्तिमान पुरुष हैं हि. जो प्रार्थना में प्रेम = स्नेहवाले हैं, कार्य आने पर भविष्य को नहीं गिनते हैं (भविष्य की चिन्ता नहीं करते हैं), गरीबों का उद्धार करते हैं, दूसरों के मनोरथ पूर्ण करते हैं, शरण में आये हुए का रक्षण करते हैं। 4. प्रा. जे निहुज्जणाई तवोवणाई सेवंति ते जणा सुधन्ना । समास विग्रह - निग्गआ दुज्जणा जेहिन्तो ताइं निहुज्जणाइं ताणि (पञ्चम्यर्थे बहुव्रीहिः)। " तवसे वणाइं तवोवणाइं (चतुर्थ्यर्थे तत्पुरुषः)। सुट्ठ धन्ना सुधन्ना (कर्मधारयः)। सं. ये निर्दुर्जनानि तपोवनानि सेवन्ते, ते जनाः सुधन्याः । हि. जो दुर्जनरहित तपोवनों की सेवा करते हैं वे मनुष्य अतिधन्य हैं। 5. प्रा. अहोणु खलु नत्थि दुक्करं सिणेहस्स, सिणेहो नाम मूलं सव्वदुक्खाणं, निवासो अविवेयस्स, अग्गला निबुईए, बंधवो कुगइवासस्स, पडिवक्खो कुसलजोगाणं, देसओ संसाराडवीए, वच्छलो असच्चववसायस्स, एएण अभिभूआ पाणिणो न गणेन्ति आयइं, न जोयन्ति कालोइअं, न सेवन्ति धम्म , न पेच्छन्ति परमत्थं, महालोहपंजरगया केसरिणो विव समत्था वि विसीयंति त्ति । समास विग्रह :- सव्वाइं य ताइं दुक्खाइं सबदुक्खाई, तेसिं सव्वदुक्खाणं (कर्मधारयः) न विवेयो अविवेयो, तस्स अविवेयस्स (नञ् तत्पुरुषः) । कुच्छिआ गई कुगई, कुगइए वासो कुगइवासो, तस्स कुगइवासस्स (कर्मधारय-षष्ठी तत्पुरुषौ)। कुसला य एए जोगा कुसलजोगा, तेसिं कुसलजोगाणं (कर्मधारयः) नत्थि सच्चं जत्थ सो असच्चो, असच्चो य एसो ववसायो असच्चववसायो, तस्स असच्चववसायस्स (बहुव्रीहि-कर्मधारय)। कालम्मि उइअं कालोइअं, तं कालोइअं (सप्तमी तत्पुरुषः)। परमो य एसो अत्यो परमत्थो, तं परमत्थं (कर्मधारयः) लोहमयो पंजरो लोहपंजरो (उत्तरपदलोपि) महंतो य एसो लोहपंजरो महालोहपंजरो (कर्मधारय), महालोहपंजरं गआ महालोहपंजरगआ (द्वितीयातत्पुरुषः)। ११६
SR No.023126
Book TitleAao Prakrit Sikhe Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaysomchandrasuri, Vijayratnasensuri
PublisherDivya Sandesh Prakashan
Publication Year2013
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size36 MB
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