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________________ आओ संस्कृत सीखें 3. जिस धातु के दो कर्म होते हैं, वह धातु द्विकर्मक कहलाता है । जिसे लक्ष्य में रखकर क्रिया की जाय उसे मुख्य कर्म और मुख्य कर्म को छोड़ क्रिया का प्रभाव जिस पर पड़ता हो, वह गौण कर्म कहलाता है । 47 e फल (नहीं जाना) दोनों चैत्र में हैं, अतः धातु अकर्मक है । 2. देवदत्तस्तण्डुलान् पचति देवदत्त चावल पकाता है यहाँ पकाने की क्रिया देवदत्त में है और पकने की क्रिया चावल में है, अतः धातु सकर्मक है । 6. 9. उदा. 1. याचका नृपं धनं याचन्तेः याचक राजा के पास धन मांगते हैं । 2. गोपो अजां ग्रामं नयतिः गोवाल बकरी को गाँव ले जाता है । 4. अर्थ बदलने पर कभी सकर्मक धातु भी अकर्मक हो जाता है और अकर्मक धातु भी सकर्मक बन जाता है । उदा. किंकरो भारं वहति नौकर भार को वहन करता है । (सकर्मक धातु) नदी वहति नदी बहती है (अकर्मक धातु) 5. कर्म न रखा जाय तो सकर्मक धातु भी अकर्मक हो जाता है । उदा. चैत्रोऽन्नं पचति (सकर्मक) । चैत्रः पचति (अकर्मक) । इन दो वाक्यों में धन और अजा मुख्य कर्म हैं और नृप और ग्राम गौण कर्म हैं । धातु सकर्मक हो तो कर्मणि प्रयोग होता है और अकर्मक हो तो भावे प्रयोग होता है । 7. कर्मणि एवं भावे प्रयोग में धातु को आत्मनेपदी के प्रत्यय लगते हैं । 8. कर्मणि एवं भावे प्रयोग में आत्मनेपदी के प्रत्यय लगाते समय 'य' प्रत्यय लगाया जाता है । ते खाद्यते । = खाद् + य + क्षुभ् + य + ते = क्षुभ्यते । कर्मणि एवं भावे प्रयोग में य प्रत्यय लगाते समय दसवें गण के इ प्रत्यय का लोप होता है, परंतु धातु में हुई गुण या वृद्धि कायम रहती है ।
SR No.023123
Book TitleAao Sanskrit Sikhe Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivlal Nemchand Shah, Vijayratnasensuri
PublisherDivya Sandesh Prakashan
Publication Year2011
Total Pages226
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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