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________________ नामचतुष्टयाप्याये प्रथमो धातुपादः एवं तर्हि "तौ पूर्वादेर्वेति" कथन्न कृतं चेत्, नैवम् । 'पर्यायशब्दानां गुरुलाघवचिन्ता नास्ति' (सीर० प० वृ० १२२) इति । तीयाद् वेति । पटुजातीयादित्यत्र न भवति, अनर्थकत्वात् । पटोः प्रकारः पटुजातीयः, प्रकारे जातीयप्रत्ययो रूढितः ।। १०७। [क० च०] विभा० । विपूर्वो भाषिरकर्मकः । यथा - निवार्यतामालि किमप्ययं वटुः पुनर्विवतुः स्फुरितोत्तराधरः। न केवलं यो महतो विभाषते शृणोति तस्मादपि यः स पापभाक्॥ (कु० सं० ५।८३)। इति, तत्कथं कर्मणि प्रत्यय इति कुलचन्द्रः। तन्न, ‘महतोऽपभाषते' इति बहुपुस्तके पाठदर्शनाद् दृष्टान्त एव न संगच्छते इत्याह-विपूर्वाद् भाषतेः कर्मणीत्यादि ।। १०७। [समीक्षा] पाणिनि ने भी पूर्वादि शब्दों से ‘स्मात् - स्मिन्' आदेश विकल्प से किए हैं - "पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा" (अ० ७।१।१६)। इस प्रकार दोनों ही व्याकरणों में 'पूर्वस्मात् - पूर्वात्, पूर्वस्मिन्-पूर्वे' शब्दरूपों का साधुत्व प्रमाणित किया गया है। [रूपसिद्धि] १. पूर्वस्मात्, पूर्वात् । पूर्व + ङसि । प्रकृत सूत्र के निर्देशानुसार पञ्चमीविभक्तिएकवचन 'सि' के स्थान में 'स्मात्' आदेश होने पर 'पूर्वस्मात्' रूप तथा 'स्मात्' आदेश के अभाव (विकल्प) में "सिरात्" (२।१।२१) से 'आत्' आदेश होने पर 'पूर्वात्' शब्दरूप सिद्ध होता है। २. पूर्वस्मिन्, पूर्वे। पूर्व + ङि । प्रकृत सूत्र के निर्देशानुसार सप्तमीविभक्तिएकवचन 'ङि' को 'स्मिन्' आदेश किए जाने पर 'पूर्वस्मिन्' शब्दरूप एवं 'स्मिन्' आदेश के अभाव (विकल्प) पक्ष में “अवर्ण इवणे ए" (१।२।२) से वकारोत्तरवर्ती अकार को एकार तथा परवर्ती इकार का लोप होने पर 'पूर्वे' शब्दरूप निष्पन्न होता है ।। १०७।
SR No.023087
Book TitleKatantra Vyakaranam Part 02 Khand 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJankiprasad Dwivedi
PublisherSampurnanand Sanskrit Vishva Vidyalay
Publication Year1998
Total Pages630
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size27 MB
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