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________________ धीरज आपीने अने तेमने पुछतां ज्यारे तेमणे आज्ञा आपी, त्यारे अमे आ देशमां आव्या छीए. ४७." माताने जीवती पण मरेली समझीने अर्थात् मारी माता यद्यपि जीवती छे, तोपण देशान्तरमा होवाथी मरेला समानज छ एवं जाणीने; तत्वोना जाणनार जीवंधरने पण खेद थयो. कारण के प्राणीओनो मातृस्नेह (मातानो प्रेम) बीजा उपायथी नष्ट थतो नथी. ४८. पछी ते बहु भारे गौरवना धारण करनार जीवंधर कुमार माताने जोवा माटे आतुर थई गया. तेनी पासे तरतज जवा लाग्या. भला एवो कोण छे, के जे पोतानी पहेला न दीठेली माताने जोवानुं ईच्छे नहि ? ४९. ते वखते माननीय स्वामी पोताना माताना स्नेहमां बीजा बधाने सर्वथा भूली गया. अने तेमना ते बळवान स्नेहे रागद्वेषादि विकार नष्ट करी दीधा. ५०. पछी तेमणे पोतानी स्त्री अने बीजा पुरुषो पासे पण पोताने जवानी वात प्रगट करी, कारण के आवश्यक कामने माटे पण बंधुओने विना पुछये विमुख थईने जर्बु दुःखदायी थाय छे. ५१. पछी पोताना साथीओ तथा बंधुओने समझावीने ते हठपूर्वक त्यांथी चाल्या गया, कारण के समझाववा बुझाववाथी अथवा अनुनयथी महान पुरुषोनो महिमा वधे छे. ५२. त्यार पछी कार्यने पुरुं करवानी बुद्धिना धारण करनार चतुर स्वामी दंडकवनमां गया अने त्यां पोतानी माताने जोईने प्रेमान्ध थइ गया, कारण के तत्त्वज्ञान अथवा विचारना जता रहेवाथी रागादिभाव प्रबळ थाय छे. ५३. पुत्रने जन्मतांज
SR No.022747
Book TitleJivandhar Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKshatrachudamani
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1913
Total Pages132
LanguageHnidi
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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