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________________ ४४ त्रिस्तुतिक मत समीक्षा प्रश्नोत्तरी दर्शाता है कि, देव - देवीयों के कायोत्सर्ग करने में कोई दोष नहीं है । बृहद्भाष्य में सम्यग्दृष्टि देव-देवी के कायोत्सर्ग करने तथा उनकी स्तुति करने को कहा गया है । ललित विस्तरा ग्रंथ में चतुर्थस्तुति को विहित एवं उपयोगी बताया गया है । देव-देवी के कायोत्सर्ग व उनकी स्तुति पूर्व श्रुतधरोंने की तथा आगम में भी कही गई है प्रश्न: मुनिश्री जयानंदविजयजी 'सत्य की खोज' पुस्तक के पृष्ठ१०२,१०३ पर सम्यग्दृष्टि देवता से समाधि - बोधि मांगने में क्या दोष है ? इस प्रश्न के उत्तरमें सम्यग्दृष्टि देवता से समाधि-बोधि मांगने से इनकार करते हैं तो उनकी यह बात उचित है ? उत्तर : नहीं, उनकी बात शास्त्रविरोधी हैं । क्योंकि, श्राद्ध प्रतिक्रमण सूत्र की अर्थदीपिका टीका तथा वृंदारुवृत्ति में; सम्यग्दृष्टि देवताओं से समाधि-बोधि मांगने में कोई दोष नहीं बताया गया है। श्राद्ध प्रतिक्रमण सूत्र की ‘अर्थदीपिका' में सभी खुलासे किए गए है। ये हम उपर देख चुके हैं । किन्तु लेखकी यह मानने को तैयार नहीं। इसलिए अपनी पुस्तकों में कुतर्क प्रस्तुत करते हैं । तथा परमतेज पुस्तक के अंशो को इस विषय में गलत तरीके से घटाने की कोशिश की है। मात्र इस परमतेज पुस्तक के पृष्ठ - २८६ पर देवता से वितरागता एवं मोक्ष की मांग कैसे करें ? इतनी ही बात की गई है। परन्तु धर्मध्यानमें आनेवाले विघ्नों को टालने के लिए सम्यग्दृष्टि देवताओं की सहायता मांगने से इनकार नहीं किया गया है । स्मरण रहे कि 'परमतेज' पुस्तक के लेखक पू. आ. श्री भुवनभानुसूरिजी चतुर्थ स्तुति को माननेवाले थे । हमने उपर जो श्राद्ध प्रतिक्रमण सूत्र की अर्थदीपिका की टीका देखी, उसके विषय में मुनिश्री जयानंदविजयजी ने उसी पुस्तक के पृष्ठ - १०३, १०४के अंतिम पेरेग्राफ में निरर्थक कुतर्क किए हैं। सत्य स्वीकार नहीं करना हैं और
SR No.022665
Book TitleTristutik Mat Samiksha Prashnottari
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSanyamkirtivijay
PublisherNareshbhai Navsariwale
Publication Year
Total Pages202
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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