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________________ २० ] श्रीतत्त्वार्थाधिगमसूत्रे [ ८१० * सूत्रार्थ-मोहनीय कर्म के उत्तरभेद दर्शनमोहनीय, चारित्रमोहनीय, कषायवेदनीय और नोकषायवेदनीय के क्रम से तीन, दो, सोलह और नौ भेद हैं। जैसे-सम्यक्त्व, मिथ्यात्व, तदुभय सम्यक्त्वमिथ्यात्व दर्शनमोहनीय कर्म के भेद हैं। चारित्रमोहनीय के कषायवेदनीय और नोकषायवेदनीय। कषायचारित्रमोहनीय के क्रोध, मान, माया और लोभ ये प्रत्येक अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरणी, प्रत्याख्यानावरणी तथा संज्वलनरूप से चार-चार प्रकार होने से सोलह भेद हैं । हास्य, रति, परति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुसकवेद ये नौ नोकषाय के भेद होते हैं ।। ८-१० ।। + विवेचनामृत ॥ * मोहनीय कर्म के मुख्य दो भेव हैं-(१) दर्शनमोहनीय तथा (२) चारित्र मोहनीय । * दर्शन मोहनीय के तीन भेद हैं-(१) सम्यक्त्वमोहनीय, (२) मिथ्यात्व मोहनीय, (३) मिश्रमोहनीय । * चारित्रमोहनीय के दो भेद हैं- (१) कषायमोहनीय, (२) नोकषाय मोहनीय । * कषाय मोहनीय के मुख्य चार भेद हैं-(१) क्रोध, (२) मान, (३) माया, (४) लोभ । * क्रोधादिक प्रत्येक कषाय के अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्याना तथा संज्वलन इस प्रकार चार-चार भेद होने से कषाय के कुल सोलह (१६) भेद हैं । (१) अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ । (२) अप्रत्याख्यान क्रोध, मान, माया, लोभ । (३) प्रत्याख्याना क्रोध, मान, माया, लोभ । (४) संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ । * नोकषाय मोहनीय के नौ भेद हैं-हास्य, रति, अरति, भय, शोक, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुसक वेद । [ शास्त्र में हास्यादिक छह कर्मों की 'हास्यषट्क संज्ञा' तथा स्त्रीवेदादिक तीन वेद की 'वेदत्रिक संज्ञा' कहने में प्राई है। ] इस प्रकार मोहनीय कर्म प्रकृति के कुल अट्ठाईस [२८] भेद हैं ।
SR No.022535
Book TitleTattvarthadhigam Sutraam Tasyopari Subodhika Tika Tatha Hindi Vivechanamrut Part 07 08
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaysushilsuri
PublisherSushil Sahitya Prakashan Samiti
Publication Year2001
Total Pages268
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size35 MB
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