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________________ -१५१ ] उपासकाध्ययन गोद्रीर्णगरलजनितमृत्युसंगतिरक्षातनामानोकहपरिहारेण व्यतिक्रान्तकिंपाकफलापादितापत्तिः पुनरविचार्य किमपि कार्य नाचर्यमिति गृहीतव्रतजातिरेकदा निशि नगरनायकनिलये नटनत्यनिरीक्षणात्कृतकालक्षेपक्षणः स्वावासमनुसृत्य शनैर्विघटितकपाटपुटसंधिबन्धः स्वकीयया सवित्र्या विहितगाढावरुण्डनमात्मकलत्रं जातनिद्रातन्त्रमवलोक्योपपत्तिशङ्कया मुहुरुत्वातखङ्गो भगवतोपपादितं व्रतमनुसस्मार । शुश्रावं च दैवात्तदैव 'मनागतः परतः सर, खरं, कहा । एक छोटे-से व्रतके कारण धनकी प्राप्तिको देखकर धन्वन्तरिका हृदय गुरु महाराजके प्रति भक्तिसे गद्गद हो गया । और वह नया व्रत ग्रहण करनेके लिए पुनः उनकी शरणमें पहुँचा । इस बार मुनिराजने उससे कहा-बलिदानके लिए आटेका पशु वगैरह बनाकर लोग चौराहों मादिपर रख देते हैं उसे तुम नहीं खाना । एक दिन धन्वन्तरि अपने मित्र विश्वानुलोम तथा अन्य साथियोंके साथ चोरी करके लौट रहा था । सब लोग भूखे थे । उन्होंने मार्गमें आटेके बने बैल रखे हुए देखे । विश्वानुलोम ने उसकी रोटी बनाकर खानेका प्रस्ताव किया। किन्तु धन्वन्तरिने अपने व्रतके कारण उसे स्वीकार नहीं किया । तब विश्वानुलोम उसपर बहुत नाराज हुआ। किन्तु धन्वन्तरि अपने नियमसे विचलित नहीं हुआ। उसके साथियोंने उस आटेकी रोटियाँ बनाई किन्तु धन्वन्तरिके स्नेहवश विश्वानुलोमने नहीं खाई। वे दोनों बच गये और उन रोटियोंको खानेवाले उनके साथी मृत्युके मुखमें चले गये, क्योंकि कोई साँप उस आटेके पुतलेको जहरीला कर गया था। व्रतके ही कारण जीवन रक्षा होनेसे धन्वन्तरि और भी अधिक प्रभावित हुआ और गुरु महाराजके पास पुनः व्रत ग्रहण करनेके लिए गया । गुरु महाराजने कहा-जिस वृक्षका नाम अज्ञात हो, उसके फल नहीं खाना । एक दिन धन्वन्तरि और विश्वानुलोम चोरी करके एक जंगलमें पहुँचे। सब लोग भूखे थे किन्तु खानेके लिए वहाँ कुछ भी नहीं था। खोजबीन करनेपर एक वृक्षपर फल लगे हुए मिले। उन्हें ही तोड़कर सब खानेके लिए बैठे। धन्वन्तरिने जैसे ही एक फल अपने मुखमें रखनेके लिए उठाया । उसे अपने व्रतका स्मरण हो आया। उसने तत्काल पूछा कि ये फल जिस वृक्षके हैं उसका नाम क्या है ? किन्तु कोई भी उसका नाम नहीं बता सका। अतः धन्वन्तरिने उनको खाना स्वीकार नहीं किया । धन्वन्तरिके साथ विश्वानुलोमने भी उन फलोंको नहीं खाया । वे विषफल थे, अतः खाते ही उनके साथी चल बसे और वे दोनों मित्र पुनः बच गये । व्रतके कारण दुबारा प्राणरक्षा होनेसे धन्वन्तरि गुरु महाराजका और भी दृढ़ भक्त बन गया और पुनः उनकी सेवामें उपस्थित होकर व्रतोंकी याचना करने लगा । इस बार आचार्यने उसे बिना विचारे कोई काम न करनेका व्रत दिया । ___.एक दिन रातमें नगरके मुखियाके मकानपर नटोंका नृत्य होता था। उसे देखकर धन्वन्तरि देरसे घर लौटा। धीरेसे द्वार खोलकर जैसे ही उसने अन्दर देखा, अपनी माता और पलीको गाढ़ आलिंगन पूर्वक सोते हुए पाया । परपुरुषकी आशङ्कासे उसे मारनेके लिए जैसे ही धन्वन्तरिने तलवार ऊपर उठाई वैसे ही उसे आचार्यके द्वारा दिये हुए व्रतका स्मरण हो आया । १. परित्यागेन मु०। २. मात्रया धृतपुरुषरूपया। ३. कृतालिङ्गनम्। ४. निद्राधीनम् । ५. श्रुतवान् गहिणीवाणी-हे मातः परतः सर यतो मे खरं कठिनं शरीरसम्बाधा इति ।
SR No.022417
Book TitleUpasakadhyayan
Original Sutra AuthorSomdevsuri
AuthorKailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2013
Total Pages664
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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