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________________ २६०] चौथा अध्याय नहीं करना चाहिये, परंतु यदि वह भोजनके निषेध करनेकेलिये किसीतरहका इशारा करना चाहे तो उसमें कोई दोष नहीं है ॥ ३४ ॥ आगे-मौनव्रत तपश्चरणके बढानेवाला और कल्याणोंका संचय करनेवाला है ऐसा दो श्लोकोंसे समर्थन करते हैं - अभिमानावने गृद्धिरोधाद्वर्धयते तपः । मौनं तनोति श्रेयश्च श्रुतप्रश्रयतायनात् ॥३५॥ ___ अर्थ-- 'मौनव्रत धारण करना भोजनकी लोलुपताको दूर करनेवाला है और इसी मौनव्रतसे याचना न करनेरूप व्रतकी रक्षा होती है इसलिये यह तपको बढाता है। तथा मौनव्रत धारण करनेसे श्रुत ज्ञानका विनय होता है इसलिये वह पुण्यको भी बढाता है । इसप्रकार मौनव्रतसे दो प्रकारके लाभ होते हैं ॥ ३५ ॥ शुद्धमौनान्मनः सिध्या शुक्लध्यानाय कल्पते । वाकासध्द्या युगपत्साधुबैलोक्यानुग्रहाय च ॥३६॥ २-सर्वदा शस्यते जोषं भोजने तु विशेषतः । रसायनं सदा श्रेष्ठं सरोगत्वे पुनर्न किं ॥ अर्थ-मौनव्रत सदा प्रशंसा करने योग्य है और फिर भोजन करनेके समय तो और भी अधिक प्रशंसनीय है। रसायन ( औषध ) सदा हित करनेवाला है और फिर रोग होनेपर तो पूछना ही क्या है उससमय वह अधिक हित करनेवाला है ही।
SR No.022362
Book TitleSagar Dharmamrut
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar Pandit, Lalaram Jain
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1915
Total Pages362
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
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