SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 236
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( २१९ ) आत्मदर्शन का प्रयोग जया जया विभावा हि, अभिद्दवंति माणसं तथा अप्पे ठिओ होज्जा, न तेसुं रमए-जए ॥१६॥ जब-जब विभाव हृदय को आक्रान्त करते हैं, तब उनमें नहीं रमें और आत्मा में स्थित हो जायें । यत्नपूर्वक ( आत्मदर्शन का ) अभ्यास करें । टिप्पण - १. साधक जाग्रत रहे । जब भी उदयभाव जोर मारता है, तब हृदय पर विकृत भाव धावा बोलते हैं । अतः साधक अपने आप पर अपना पहरा लगाता रहे । २. जब विभावों से अपने को आक्रान्त होते देखे, तब उनसे अभिभूत न होकर यत्ना करे । तत्काल आत्मदर्शन करने लगे अर्थात् उन विकारों का भेदन कर शुद्ध आत्मा में अपने उपयोग को जमाये । २. प्रतिसंलीनता द्वार पडिलोणयाए वा, दंसणं तेण होइ सा । अत्थो उपसिद्दस्स, विमुहोऽभिमुहो व सो ॥१७॥ प्रतिसंलीनता से दर्शन अथवा उस (दर्शन) से वह (प्रतिसंलीनता) होती है । 'प्रति' शब्द का अर्थ ( जिस शब्द के साथ वह जुड़ता है) वह 'विमुख' या 'अभिमुख होता है । टिप्पण - १. दर्शन प्रतिसंलीनता का साधक हेतु बनता है और प्रतिसंलीनता उसकी सहायिका बनती है । २. 'प्रति' शब्द उपसर्ग है । इसके कई अर्थ होते हैं । यहाँ इसके दो अर्थ लिये हैं—- विमुखता और अभिमुखता । जिस शब्द के पहले आता है, उसका वह विपरीत अर्थ कर देता है । जैसे 'क्रमण' शब्द का अर्थ है - चलना । इस शब्द से पहले 'प्रति जुड़कर प्रतिक्रमण शब्द होता है, जिसका अर्थ है 'पीछे चलना - लौटना' । 'कर्म' शब्द का
SR No.022226
Book TitleMokkha Purisattho Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUmeshmuni
PublisherNandacharya Sahitya Samiti
Publication Year1990
Total Pages338
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size16 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy