SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 102
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ क. ४७ अर्थः- वननी अंदर एकाकि कृष्ण वासुदेवनुं पोताना माइथोज जो कर्म न हो तो मरण केम थाय. ? ॥ १८ ॥ नावारुढस्स उवसग्गो वद्धमाणस्स दारुणो सुदाढाओ कहं तो न हुतं जइ कम्मयं ॥ १९॥ अर्थः- जो कर्म न मानीये तो नाव उपर चडेला श्रीमान् वर्द्धमान स्वामिने सुदृट्टयो भयंकर उपसर्ग केम थाय. ? ॥ १९ ॥ पासनाहस्स उवसग्गो गाढो तिथ्थंकरस्स वि; कमठाओ कहं तो न हुतं जइ कम्मयं ॥ २० ॥ अर्थ:- तीर्थकर परमात्मा पार्श्वनाथ महाराजने कपडयी आकरो उपसर्ग थयो तेवां कर्मज कारण छे. ॥ २० ॥ अणुत्तरा सुरासाया सुख्ख सोहग्गलीलया; कहें पार्वति चवर्ण न तं जइ कम्मयं ॥ २१ ॥ :- अनुत्तर विमानवासि श्रेष्ठ देवो जेओ के सुखनी पूरी सामग्रोथी युक्त छे ते पण व्यवी मृत्युलोकमां आवे छे तेनुं कारण कर्मज मानवुं पडशे ॥ २१ ॥ ॥ इति श्रीकर्मकुलकं संपूर्ण ॥ १७
SR No.022111
Book TitleKulak Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBalabhai Kakalbhai
PublisherBalabhai Kakalbhai
Publication Year1915
Total Pages112
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size10 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy