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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra Acharya Shri Kailassagarsuri Gyarmandie www.kobairthorg ___ अर्थ--राक्षसीओने विषये गृद्धा विश्वास न करवो. ज्ञानादि जीचितनो अपहार करे छे तेथी खीयोने राक्षसीओ कही. ते उत्तराध्य- स्त्रीयो केवी छे? गंडवक्ष: एटले छाती उपर जेओने गढ= महोटां गुमडा जेवो व्याधि थयेलो होय . वैराग्य उपजाववा माटे स्त HEभाषांतर अध्ययन८ नने गुमडांनी उपमा आपेली छे. वळी ते खीयो केवी होय छे? अनेकचित्ता अनेकपुरुषोमा जेनां चित्त होय, अथवा अनेक पुरु॥४५॥ पोनां जेमां चित्त होय, अथवा अनेक क्षणे क्षणे बदलाता छे चित्त जेना एवी जे खीयो राक्षसीयो पुरुष कुलीन मानवने प्रलोभन ॥४५३॥ आपीने अर्थात् ' तमेंज मारा भर्ता, तमेज मारा जीवित, तमेज मारुं शरण; इत्यादि वचनोवडे वश्य करीने प्रीति उत्पन्न करी ते पुरुषोनी साथे रमे के क्रीडा करे छे. केनी पेठे? दासनी पेठे ते कुलीन पुरुषो पण स्त्रीयोमां व्यामोहित थतां दास जेवाज बनी २६ जाय छे. जेम दास 'जाओं' 'बेसी जाओ' 'उभा रहो' 'आ काम म करशो' इत्यादि स्वामीनां वचनो सांभळी तेना आज्ञाकारी Jellथाय छे तेम स्त्रीयोने वश थयेला पुरुषो पण किंकर बनी जाय छे. १८ नारोसु नोपगिज्झिजा। इत्थी विपजहे अणगारे ॥धम्मं च पेसलं णच्चा। तत्थ ठविज भिक्खू अप्पाणं॥१९/६ मूलार्थ-(नारीसु) नारीओने विषे (नो पगिज्झिज्जा) अभिलाषा न करे, तथा (अणगारे) साधु (इत्थी) खीओने [विपजहे] त्याग iral करे (धम्म' च) धर्मनेज [पेसल] अस्यत मनोहर (णचा) जाणीने (तत्थ) तेने विषे (भिक्खू) साधु [अप्पाणं] पोताना आत्माने JE (उबिज) स्थापन करे. १९ व्या०-अनगारः साधुः स्त्रीषु न गृध्ध्यन्न गृद्धि कुर्यात् , अनगारः स्त्रियं विशेषेण प्रजयात्परित्यजेत् , पुनर्भिell क्षुर्धर्म ब्रह्मचर्यादिरूपं पेशलं मनोज्ञं ज्ञात्वा तत्र अत्मानं स्थापयेत. ॥ १९॥ For Private and Personal Use Only
SR No.020855
Book TitleUttaradhyayan Sutram Part 02
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorLakshmivallabh Gani
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1935
Total Pages290
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size15 MB
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