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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailashsagarsuri Gyanmandir प्रथमस्तम्भः। इंद्रकों पूछ कि यज्ञ करानेवालेने इंद्रकी स्तुति ठीक करी है, कि नहीं? यह सुण कर इंद्र तेरेको श्रेष्ठ धन पुत्रादि सर्व औरसें देवेगा. तदनु एक ऋचामें-हमारे ऋत्विज इंद्रकों कहे, हमारे निंदक इस देशमें, तथा अन्य देशोंमें भी न रहे. ____त. एक०-हे इंद्र! तेरे अनुग्रहसे हमारे शत्रु भी मित्रभूत हुए बोलते हैं. त. तीन०-इंद्रकों सोमवल्लीका रस देवो, जिसकों पीके इंद्र वृत्रनामारि असुर शत्रुयांकों हननेवाला होवे, और संग्राममें, हे इंद्र ! तूं अपने भक्तकी रक्षा करनेवाला हो, हे इंद्र! तेरेकों अन्नवाला करते हैं. तदन एक ऋचामें-इंद्र धनकी भूमिका रक्षक है, इस वास्ते हे ऋविजो! तुम इंद्रकी स्तुति करो. त० एक०-हे ऋत्विजो! शीघ्र इस कर्ममें आवो! आवो! आ कर बैठो; बैठ कर इंद्रकी स्तुति करो. त. एक०-हे ऋत्विजो! तुम सर्व एकठे होकर इंद्रकों गावो. त० एक०-पूर्व मंत्रोक्त गुणवाला इंद्र हमकों पूर्व अप्राप्त पुरुषार्थकों प्राप्त करो! और, सोइ इंद्र धन, स्त्री, अथवा बहुत प्रकारकी बुद्धियांकों सिद्ध करो. त० नव०-इंद्रके रथ घोडोंका कथन, और इंद्रकी प्रार्थना. त० एक०-इंद्रही आग्नि, वायु, सूर्य, नक्षत्रके रूपसें रहा हुआ है. त० एक०-इंद्रके घोडे रथका वर्णन. त० एक०-सूर्यका वर्णन. त० पांच०-मरुतका वर्णन, पणि नामक असुरोंने स्वर्गसें गौआं चुरायके अंधकारमें छिपा रखी. पीछे इंद्र मरुतोंके साथ तिनकों जीतता हुआ, इंद्र मरुतकी स्तुति, और आमंत्रण. त० एक०-इंद्र आकाशादिकोंसें ल्याके हमकों धन देवो. त० नव०-इंद्रकी अनेक रूपसें स्तुति. For Private And Personal
SR No.020811
Book TitleTattva Nirnayprasad
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVallabhvijay
PublisherAmarchand P Parmar
Publication Year1902
Total Pages863
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size19 MB
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