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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir १४० सूत्रकृतागले मूलम्-आउक्खयं घेवं अबुज्झमाणे, ममाति से साहसकारि मंदे। अहोयराओ परितप्पमाणे, अद्वेसु मुंढे अजरामरेठव॥१८॥ छाया-आयुःक्षयं चैवाऽबुध्यमानो, ममेति स साहसकारी मन्दः । अहनि च रात्रौ च परितप्यमानः, अर्थेषु मूढोऽजरामर इव ॥१८॥ अन्वयार्थः- (आउवयं चेव अबुज्झमाणे) आरम्मामक्तः पुरुषः आयुः क्षयं आयुषो जीवनलक्षणस्य क्षयं-विनाशमबुद्धयमानोऽजानन् (ममावि से) ममेति इदं मे अहमस्य इत्येवं वक्ता ममत्ववानित्यर्थः सः (पाहसकारिमंदे) साहसकारी 'आउक्खयं' इत्यादि। शब्दार्थ--'आरक्वयं चेव अबुझमाणे-आयु क्षयं चैवाऽअध्य मानः' आरम्भमें आसक्त पुरुष आयुका क्षय को नहीं जानता है 'ममा तिसे-ममत्यवान' परंतु वह पुरुष वस्तुओं पर अपनी ममता रखता हुभावह 'साहसकारि मंदे-साहसकारिमन्दः' पाप कर्म करता ही रहता है और 'अहोय रामो य परितप्पमाणे-अहनि च रात्रौ च परितप्यमानः' दिन रात चिंतामग्न होकर दुःख का अनुभव करता है एवं 'अढेसुअर्थेषु' धन धान्य आदिमें 'अजरामरेश्व-अजरामरवत्' अपने को अजर एवं अमर समझता हुआ 'मूढे-मूढः' धन ओदि में आसक्ति वाले बने रहते हैं ॥१८॥ अन्वयार्थ---अपनी आयु के क्षय को नहीं जानता हुआ ममतावान् पुरुष साहसकारी होता है। वह दिन रात संताप का अनुभव करता 'आउखयं' या शाय-'आउक्खय चेत्र अबुज्ज्ञमाणे-श्रायुःक्षय चैवाऽवबुध्यमानः' मा. आमा मासत मेवः ५३५ सायुज्यना क्षयने यता नथी. 'ममातिसे-ममन्वपान्' ५२ ते ५३५ परतु। ५२ पोतानी ममता सभीने 'साहसकारिमंदेमाहसकारिमन्दः' पा५४ ४ ४२ते। २९ छे. अने 'अहोय राओय-परीतप्प. माणे अनि च रात्रौ च परितप्यमानः' रात बिता युवा मनीने मना अनुम५ ४३. छ. तर 'अढेसु:-अर्थ'पु' धन धान्य विभा 'अजरामरेख अजरामरवत्" पाताने म१२ अने अमर भानीने 'मूढे-मूढः' ५। विगरेभा આસક્તિ વાળ બની રહે છે. ૧૮ , અન્વયાર્થ-પિતાની આયુષ્યના ક્ષયને ન જાણતે મમતવાળે પુરૂષ સાહસિક થાય છે. તે રાત દિવસ સંતાપ યુક્ત બનીને ધન, ધાન્ય વિગેરે For Private And Personal Use Only
SR No.020780
Book TitleSutrakritanga Sutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherJain Shastroddhar Samiti
Publication Year1970
Total Pages596
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size11 MB
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