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________________ २५५ नथी स्नेहराग समान नत्कृष्टु नथी समकितना लान समान बंधन। नत्कृष्टो लान॥१॥ नपेमरागा मरमनि बंधो। नबोहिलाना परमबि लानो न सेववी वा न नोगववी प्रेम न सेववा वा न आदर[॥१॥ दा वा स्त्री परनी। वा पुरष जे अजाण वा मूढने॥ नसेवियव्वा पमया परक्का। नसेवियव्वा पुरिसा अविद्या न सेववा अधम अनिमानी हीणा नरने । | नसेवियव्वा अहमानि हिणा। न सेववा चामीकरणहार मनुषने ॥१३॥ नसेवियव्वा पिसुणा मणुस्सा ॥१३॥ जे धरमी नर तेहने निश्चे सेववा आदरवा। जेधम्मियाते खलु सेवियव्वा । जे पंमित नर तेहने निश्चे पुनर्बु ॥ जेमियाते खलु पुछियव्वा ॥ जे साधु वा जला नर तेहने समस्त रीते वांदवा। जे साहुणो ते अनि वंदियव्वा । ||जे निरलोनी ममतारहीत नर तेहने आहारादी दान देवू ॥१४॥ जे निम्ममाते पमिलानियव्वा ॥१४॥ पुत्र तथा शिष ए बेने तुल्य विचारवा विनय माटे। पुत्ताय सीसाय समं विनत्ता। रूषीस्वर तथा देवता ए बेने तुल्य विचारवा । रिसीय देवाय समं विनत्ता ॥ अज्ञानी नर तथा पशु जीनावर ए बेने तुल्य विचारवा।
SR No.020562
Book TitlePrakaran Mala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavchand Jechand Shah
PublisherRavchand Jechand Shah
Publication Year1888
Total Pages226
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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