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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 49 कहिया हवंति तच्चत्या। (निय. ८) -चक्खु पुं न [चक्षुष्] आगमरूपी नेत्र। आगमचक्खू साहू। (प्रव.चा. ३४) -चेट्न स्त्री [चेष्टा] आगम के विषय में प्रयल, आगमज्ञान का आचरण| आगमचेट्ठा तदो जेट्ठा। (प्रव.चा.३२) -पुब्ब पुं न [पूर्व] आगमपूर्वका आगमपुव्वा दिट्ठी, ण भवदि जस्सेह संजमो तस्स। (प्रव.चा.३६) -हीण वि [हीन] आगम से हीन, आगम से अपूर्ण। आगमहीणो समणो, णेवपाणं परं वियाणादि। (प्रव. चा. ३३) आगाढ वि [आगाढ] प्रबल, अत्यन्त। (पंचा.६७) अण्णोण्णागाढगहणपडिबद्धा। -गहणपडिबद्ध वि [ग्रहण-प्रतिबद्ध अत्यन्त सघन मिलाप से बन्ध अवस्था को प्राप्त। (पंचा.६७) आगास/आयास पुन [आकाश] आकाश, द्रव्य का एक भेद। (पंचा. ९७, प्रव. जे. ४१, ४३) जो जीव एवं पुद्गलों को निरंतर स्थान देता है वह आकाश है। सव्वेसि जीवाणं सेसाणं तह य पुग्गलाणं च। जं देदि विवरमखिलं तं लोए हवदि आयासं। (पंचा.९०) आजुत्त वि [आयुक्त] लगाना, संयुक्त करना। आजुत्तोतं तवसा। (प्रव.चा. २८) आणपाण/आणप्पाण पुं [आनप्राण] श्वासोच्छ्वास। (बो. ३३,३४) आणपाणभासा य। (बो.३३) आणा स्त्री [आज्ञा] आज्ञा, आदेश, कथन। पयडदि लिंगं जिणाणाए। (भा.७३) आणाए (तृ. ए. भा. ७३) आतव पुं न [आतप] आतप, गर्मी, नाम कर्म का एक भेद। For Private and Personal Use Only
SR No.020450
Book TitleKundakunda Shabda Kosh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaychandra Jain
PublisherDigambar Jain Sahitya Sanskriti Sanskaran Samiti
Publication Year
Total Pages368
LanguageSanskrit
ClassificationDictionary
File Size9 MB
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