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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 188 कालिदास पर्याय कोश तस्य पूर्वोदितां निन्दां द्विजः पुत्र समागतः। 14/57 पुत्र के जी उठने पर उस ब्राह्मण ने स्तुति से पहले जो निन्दा की थी, उसे धो डाला। स्वर संस्कार वत्यासौ पुत्राभ्यामथ सीतया। 15/76 पुत्रों के साथ जाती हुई सीता ऐसी लग रही थीं, मानो स्वर और संस्कारों के साथ गायत्री जा रही हों। स तक्ष पुष्कलौ पुत्रौ राजधान्योस्तदाख्ययोः। 15/89 उन्होंने तक्ष और पुष्कल नाम के योग्य पुत्रों को, तक्ष और पुष्कल राजधानियों का राजा बना दिया। इत्यारोपितपुत्रास्ते जननीनां जनेश्वराः। 15/91 इस प्रकार पुत्रों को राज्य देकर उन चारों ने अपनी स्वर्गीय माताओं के श्राद्ध किए। अतिथि नाम काकुत्स्थात्पुत्रं प्राप कुमुद्वती। 17/1 वैसे ही कुश को कुमुद्वती से अतिथि नाम का पुत्र प्राप्त हुआ। अनूनसारं निषधान्नगेन्द्रात्पुत्रं यमाहुर्निषधाख्यमेव। 18/1 अतिथि ने निषध पर्वत के समान बलवान पुत्र उत्पन्न किया और उसका नाम भी निषध रक्खा। स क्षेमधन्वाममोघधन्वा पुत्रं प्रजाक्षेम विधानदक्षम्। 18/9 उन सफल धनुषधारी पुंडरीक ने प्रजा का कल्याण करने में समर्थ अपने पुत्र क्षेम धन्वा को राज सौंप दिया। पुत्रस्तथैवात्मजवत्सलेन स तेन पित्रा पितृमान्बभूव। 18/71 वैसे ही पुत्र को प्यार करने वाले पिता को पाकर देवानीक भी पिता वाले हुए। तं पुत्रिणां पुष्करपत्रनेत्रः पुत्रः समारोपयदग्रसंख्याम्। 18/30 उनके सुपुत्र ने पुत्रवानों का शिरोमणि बना दिया, उन कमललोचन का नाम भी पुत्र ही था। 11. प्रजा :-[प्र+जन्+ड+टाप्] संतान, प्रजा, संतति। यश से विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम्। 1/7 अपना यश बढ़ाने के लिए ही दूसरे देशों को जीतते थे, जो भोग-विलास के लिए नहीं वरन् सन्तान उत्पन्न करने के लिए ही विवाह करते थे। For Private And Personal Use Only
SR No.020426
Book TitleKalidas Paryay Kosh Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTribhuvannath Shukl
PublisherPratibha Prakashan
Publication Year2008
Total Pages487
LanguageHindi
ClassificationDictionary
File Size18 MB
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