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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir कलिकालसर्वज्ञ विरचित श्रीसिद्धहेमचंद्र व्याकरणस्थ न्यायसंग्रहः॥ स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा ॥१॥ सुसर्वार्द्धदिक्शब्देभ्यो जनपदस्य ॥२॥ ऋतोवृद्धिमद्विधाववयवेभ्यः ॥३॥ स्वरस्य इस्वदीर्घप्लुताः ॥४॥ आद्यन्तवदेकस्मिन् ॥५॥ प्रकृतिवदनुकरणम् ॥६॥ एकदेशविकृतमनन्यवत् ॥७॥ भूतपूर्वकस्तद्वदुपचारः ॥८॥ भाविनि भूतवदुपचारः ॥९॥ यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् ॥१०॥ विवक्षातः कारकाणि ॥११॥ अपेक्षातोऽधिकारः ॥१२॥ अर्थवशाद्विभक्तिपरिणामः ॥१३॥ अर्थवग्रहणे नानर्थकस्य ॥१४॥ लक्षणप्रतिपदोक्त्योः प्रतिपदोक्तस्यैव ग्रहणम् ॥१५॥ नामग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ॥१६॥ प्रकृतिग्रहणे यन्लुबन्तस्यापि ॥१७॥ For Private and Personal Use Only
SR No.020423
Book TitleKusumavali
Original Sutra AuthorHemchandracharya
Author
PublisherRushabhdevji Chhagniramji Jain Shwetambar Samstha
Publication Year1943
Total Pages262
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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