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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org ११२ महाकवि शोभन और उनका काव्य इस पद्य के चारों पदों में सुन्दरतर यमकालंकार की भरमार विद्वानों के चित्त को चमत्कृत करने वाली है । Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir बैरोट देवी की स्तुति याता या तारतेजाः सदसि सदसिभृत्कालकांतापारिं पारिन्द्रराज सुरवसुरवधूपूजिताऽरं जितारम् । सा त्रासात् श्रायां त्वामविषम विषभृदभूषणाऽभीषणा भीही नाहीनाsपत्नी कुवलयवलयश्यामदेहाऽमदेहा ॥ ९२ ॥ इस कृति में छोटे बडे अनेक प्रसिद्ध तथा अप्रसिद्ध विशिष्ट छंद और अलंकार ऐसे हैं जो विद्वानों के हृदय में बहुत ही आनन्द उत्पन्न करते हैं । विभिन्न अलंकारों तथा छंदों में अपने भावों का सफलतापूर्वक समावेश करना कितना कठिन है, यह बात कविता बनानेवाले ही समझ सकते हैं। ऐसे चमत्कारपूर्ण यमक अनुप्रासादि अलंकारों से युक्त उत्तम काव्य बनाते समय शोभन मुनि का चित कितना एकाग्र हुआ होगा, इसका अनुमान हमारे पाठक कर सकते हैं । हाँ एक उदाहरण 'प्रभावक चरित्र' में भी मिलता है । एक समय की बात है शोभन मुनि “जिन स्तुति चतुर्विंशतिका" बना रहे थे । उसी बीच में आप गौचरी ( मधुकरी भिक्षा ) लेने गये । चलते-चलते प्रस्तुत कृति बनाने की एकाग्रता में इनका चित्त इस प्रकार लीन रहता था कि अपना ख्याल न रहने के कारण एक बार एक ही श्रावक (जैन गृहस्थ) के घर तीन बार गौचरी के हेतु चले गये । जब तीसरी बार उसी स्थान पर गौवरी · For Private and Personal Use Only
SR No.020374
Book TitleHimanshuvijayjina Lekho
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHimanshuvijay, Vidyavijay
PublisherVijaydharmsuri Jain Granthmala
Publication Year
Total Pages597
LanguageGujarati, Hindi
ClassificationBook_Gujarati
File Size18 MB
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