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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir गट्टच्यादिवर्गः । १२३ तिक्त, हलकी, बुद्धीकों बढानेवाली है, शीतल, कसेली, मधुर पाकमें मधुर आयुकों देनेवाली, रसायनी है ॥ २८० ॥ और स्वरकों अच्छा करनेवाली, स्मृतिकों देनेवाली तथा कुष्ठ, पाण्डुरोग, प्रमेह, रक्त, कास, इनकों हरनेवाली है. और विष, शोथ, ज्वर, इनकों हरती है. मण्डूकपर्णाभी गुणेंसें ब्रह्मीके समान है || २८१ ॥ अथ द्रोणपुष्पी (गुमा) नामगुणाः. द्रोणा च द्रोणपुष्पी च फलेपुष्पा च तिक्तिका । द्रोणपुष्पी गुरुः स्वाद्वी रुक्षोष्णा वातपित्तकृत् ॥ २८२ ॥ सतीक्ष्णलवणा स्वादुपाका कट्टी च भेदिनी । कफामकामलाशोथतमकश्वासजन्तुजित् ॥ २८३ ॥ टीका-द्रोणा, द्रोणपुष्पी, फलेपुष्पा, तिक्तिका यह गोमाके नाम कहे गये हैं. गोमा भारी, मधुर, रूखी, गरम, वातपित्तकों करनेवाली है ॥ २८२ ॥ तीखी, नमकयुक्त, पाक में मधुर, और कटु, तथा भेदन है. और कफ, आम, कामला, शोथ, तमक, श्वास, कृमि, इनकों हरनेवाली है ॥ २८३ ॥ अथ सुवर्चल (हुरहुराद्वितीय हुरहुर) गुणाः. सुवर्चला सूर्यभक्ता वरदावरदापि च । सूर्यावर्ता रविप्रीताऽपरा ब्रह्मसुवर्चला || २८४ ॥ सुवर्चला हिमा रुक्षा स्वादुपाका सरा गुरुः । आपित्तला कटुः क्षारा विष्टम्भकफवातजित् ॥ २८५॥ अन्या तिक्ता कपायोष्णा सरा रूक्षा लघुः कटुः । निहन्ति कफपित्तास्त्रश्वासकासारुचिज्वरान् ॥ २८६ ॥ विस्फोटकुष्ठमेहास्त्रयोनिरुक्कृमिपाण्डुताः । टीका - सुवर्चला, सूर्यभक्ता, वरदा, सूर्यावर्ता, रविनीता, और दूसरी ब्रह्म सुवर्चला यह दूसरे हुरहुरके नाम हैं || २८४ ॥ हुरहुर शीतल, रूखी, पाक में मधुर, सर, भारी, पित्तकों करनेवाली, कडवी, क्षार है. और विटंभ, कफवातकों हरनेवाली है || २८५ || और दूसरी तिक्त, कसेली, गरम, सर, रूखी, हलकी, For Private and Personal Use Only
SR No.020370
Book TitleHarit Kyadi Nighant
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRangilal Pandit, Jagannath Shastri
PublisherHariprasad Bhagirath Gaudvanshiya
Publication Year1892
Total Pages370
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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