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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir (१२५) (ढाल ४, नमो भवि भावसु ए-ए राह ) कान पयंपे नेमने ए, धन्य धन्य यादव वंश । जिहाँ प्रभु अवतर्या ए, मुज मन मानस हंस, जयो जिन नेमने ए ॥१॥ धन्य शिवादेवी मावडी ए, समुद्रविजय धन्य तात । सुजाती जगतगुरु ए, रत्नत्रयी अवदात ॥ ज० ॥२॥ चरण विरोधी ऊपन्यो ए, हुं नवमो वासुदेव ज० । तिणे मन नवि उल्लसे ए, चरण धरमनी सेव ॥ ज० ॥३॥ हाथी जेम कादव गल्यो ए, जाणुं उपादेय हेय ज० । तो पण हुन करी सकुं ए, दुष्ट कर्मनो भेय ॥ ज० ॥४॥ पण शरणुं बलियातणुं ए, कीजे सीझे काज ज० । एहवां वचनने सांभलीए, बांहे ग्रह्यानी लाज ॥ ज० ॥५॥ नेम कहे एकादशी ए, समकित युत आराध ज० । थाईश जिनवर बारमो ए, भावी चोवीसीये लाध ॥ ज० ॥ ६ ॥ (कलश) इय नेमिजिनवर नित्य पुरन्दर, रैवताचल मंडणो, बाण नन्द मुनि चन्द (१७९५) वरसे, राजनगरे संथुण्यो। संवेगरंग तरंग जलनिधि, सत्यविजय गुरु अनुसरी, कपूरविजय कवि क्षमाविजगणि जयविजय जयसिरिवरी॥१॥ एकादशी आरंभवर्जनसज्झाय ।। ( मारा हाथ में नोकारवालो मारे अरिहंत- ए राह ) भर्या निवाण में झीलण लागा, जल में कोगला जे For Private And Personal Use Only
SR No.020303
Book TitleDevasia Raia Padikkamana Suttam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayantvijay
PublisherAkhil Bharatiya Rajendra Jain Navyuvak Parishad
Publication Year1964
Total Pages188
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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