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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ४४८ अनादि मिथ्यात्व निवास, पूरण संज्ञा कहीए तास ॥ आगम ज्ञान लह्यो जेणीवार, कृष्णपक्षी जीत्यो तेणीवार ॥ ३ ॥ मातंगयद सिद्धाइ देवी, सांनिध्यकारी कीजे स्वयमेवि ॥ कवि ज्ञानविमल कहे शुभचित, मंगल लीला करो नित नित ॥ ४॥ ॥अथ पन्नर तीथीनी थोयो । ॥ दीन सकल मनोहर ॥ ए देशी ॥ ॥सासयने असासय, चैत्यतणा बिहु भेद ॥ थापन स्वरुपे, रूपातित बेहु भेद ॥ बिहु पक्षे ध्यावो, जिम होये भव छेद ॥ अविचल सुखपामे, नासे सघला खेद ॥ १ ॥ उत्सर्पिणी अवसर्पिणी, काल बे भेद प्रमाण ॥ त्रिजेने चोथे, आरे जीनवर भाण ॥ उकृष्टा काले, सत्तरिसय जिनराज ॥ तिम वीस जघन्यथी, वदे सारो काल ॥ २ ॥ बिहुँ भेद भाख्या, जिव सकल जगमाहे । एक कृष्णपक्षी एक, शुक्लपही पणमाहे ॥ वली द्रव्य कह्या छे. जीव अजीव विचार । ते आगम जाणो, निश्चयने व्यवहार ॥३॥ संजमधर नुनिवर, श्रावक जे गुणवंत । बिहु पक्षना For Private And Personal Use Only
SR No.020137
Book TitleChaityavandan Stuti Stavanadi Sangraha Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurvacharya
PublisherMaster Umedchand Raichand
Publication Year1932
Total Pages539
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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