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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra व्याख्या प्रज्ञप्तिः ॥ १९० ॥ www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir कहेतुं, उपपात, संकल्प, अभिषेक, विभूषणा, व्यवसाय, अर्चनिका, अने सिद्धायतन संबंधी गम तथा चमरनो परिवार अने तेनुं ऋद्धिसंपन्न पणुं ॥ ११५ ॥ भगवत् सुधर्मस्वामीप्रणीत श्रीमद् भगवतीसूत्रना बीजा शतकमां आठमा उद्देशानो मूलार्थ संपूर्ण थयो. उद्देशकः ९. किमिदं भंते! समयखेत्तेत्ति पचति १, गोयमा ! अड्ढाइजा दीवा दो य समुद्दा एस णं एवइए समयग्वतेति पञ्चति, तस्थ णं जंबुद्दीवे २ सव्वदीवसमुद्दाणं सव्वन्भंतरे एवं जीवाभिगमत्रत्तव्वया (जोइसविणं) नेयव्वा जाव अभितरं पुक्खरद्धं जोइसविणं (इमा गाहा) || सू० ११६) वितीयस्स नवमो उद्देसो ॥। २-९ ।। [प्र०] हे भगवन ! आ समयक्षेत्र ए शुं कहेवाय ? [ उ० ] हे गौतम ! अढी द्वीप अने वे समुद्र, एटलं ए समयक्षेत्र कद्देवाय, तेमां जे आ जंबूद्वीप नामनो द्वीप छे ते बघा द्वीप अने समुद्रोनी बचोवच छे. ए प्रमाणे सर्व जीवाभिगमसूत्रमां कं छे ते प्रमाणे कहे. यावत्-अभ्यंतर पुष्करार्ध. पण तेमां ज्योतिषिकनी हकीकत न कहेवी. ॥ ११६ ॥ भगवत् सुधर्मस्वामीप्रणीत श्रीमद् भगवतीमूत्रना बीजा शतकमां नवमा उद्देशानो मूलार्थ संपूर्ण थयो. For Private and Personal Use Only २ शतके उद्देशः ९. ॥ १९०॥
SR No.020106
Book TitleBhagvati Sutram Part 01
Original Sutra AuthorSudharmaswami
Author
PublisherHiralal Hansraj
Publication Year1937
Total Pages330
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size8 MB
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