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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir REAKIRTAIN PREMIEREree GAONLON " सत्र एकत्रिंशत्तम-अनुयोगद्वार सूत्र-चतुर्थ मूल. नाणं पंचविहं पण्णत्तं तंजहा-आभिणिबोहि य नाणं,सुय नाणं,ओहि नाणं,मापजव नाणं, केवल णाणं // 1 // तत्थ चत्तारिनाणाई ठप्पाई, ठवणिजाई, जोउद्दिसिजंति, जोसमुद्दिन A8+ एकत्रिंशत्तम्-अनुयोगद्वार मूत्र-चतुर्थ मूर श्रुतज्ञान बण.0 जिस के द्वारा वस्तुओं का स्वरूप माना जावे अथवा तो जो निज म्वरूप का प्रकाशक है वह ज्ञान / उस के पांच भेद अर्हन्तं देवने कहे हैं जिन के नाम- जो सन्मुख आय हुए पदार्थों को मर्यादा पूर्व जानता है वह आभिनियोधिक ज्ञान है. इस ज्ञान का अपर नाम मतिज्ञान है. 2 को सुनकर पदायों के स्वरूप को जानता है उसे श्रत ज्ञान कहते हैं, जो मर्यादा पूर्वक रूपी पदार्थों को जानता है वह अवधि ज्ञान है. 4 जो मन के पदार्थों को जानता है वह मनःपर्यव ज्ञान है और 5 संपूर्ण लोकालोक के वरू को जाननेवाला केवल जान कहलाता // 1 // इन पांचों ज्ञान में से श्रुत ज्ञान को छोड़ कर शेष चार / / 8 For Private and Personal Use Only
SR No.020050
Book TitleAnuyogdwar Sutram
Original Sutra AuthorN/A
Author
Publisher
Publication Year
Total Pages373
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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