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________________ २७४ पाइअसहमहण्णवो खव-खाण १, १८) । संकृ. खवइत्ता, खवित्तु, खवेत्ता खस देश में रहनेवाला मनुष्य (पएह १-पत्र खाअ वि [खात] १ खुदा हुआ। २ न. खुदा (भग १५; सम्य १६, प्रौप)। १४ इक)। हना जलाशय; 'खामोदगाई' ( कप्प)। ३ खव पुं[दे] १ वाम हस्त, बायाँ हाथ । २ खसखस खसखस] पोस्ता का दाना, ऊपर में विस्तारवाली और नीचे में संकुचित गर्दभ, रासभ (दे २, ७७)। उशीर, खस (सं ६६)। ऐसी परिखा । ४ ऊपर और नीचे समान रूप खबग वि [क्षपक] १ नाश करनेवाला, क्षय खसफस अक [दे] खसना, खिसकना, गिर | से खुदी हुई परिखा (प्रौप) । ५ खाई, परिखा करनेवाला । २ पुं. तपस्वी जैन-मुनि (उवः पड़ना । वक खसफसेमाण (सुर २,१५)। पान)। भाव ८)। ३ वि. क्षपक श्रेणि में प्रारूढ़ | खसफसि वि [दे] व्याकुल, अधीर । हूअ खाइ स्त्री [खाति] खाई, परिखा (सुपा २६४) । (कम्म ५)। °सेढि स्त्री [श्रेणि] क्षपण- वि [भूत] व्याकुल बना हुआ (हे ४, खाइ स्त्री [ख्याति] प्रसिद्धि, कीति (सुपा क्रम, कर्मों के नाश की परिपाटी (भग ६, ४२२)। ५२६: ठा ३, ४)। ११, उबर ११४)। खसर देखो कसर = दे कसर (जै २ स | खाइ[दे] देखो खाई (पोप)। खडिदे] स्खलित, स्खलन-प्राप्त | ४८०)। खाइअ देखो खइअ = क्षायिक (विसे ४६) (द २,७१)। खसिअ देखो खइअ = खचित (हे १. १९३)। २१७५: सत्त ६७ टी)। खबग । न [क्षपण] १ क्षय, नाश (जीत)। | खसिअ न [कसित ] रोग-विशेष, खाँसी | खाइअ वि [खादित] खाया हुमा, भुक्त, खवणय २ डालना, प्रक्षेप (कम्म ४,७५)। (हे १,१८१)। भक्षित (प्राप; निर १, १)। ३ पृ. जैन-मुनि (विसे २५८५; मुद्रा ७८)। खसि बि [दे] खिसका हुआ (सुपा २८१)। खाइआ स्त्री [दे. खातिका] खाई, परिखा खवण देखो खमण, 'विहिय पक्खखवणे सो' खसु पुं[दे] रोग-विशेष, पामा, गुजराती में (दे २, ७३, पान सुपा ५२६) भग ५, ७; (धर्म २३)। पएह २,५)। 'खस' (सरण)। खवणा स्त्री [क्षपणा] अध्ययन, शास्त्र-प्रकरण " खह पुन [खह] आकाश, गगन (भग २०, खाई अ [दे] १-२ वाक्य की शोभा और (प्रणु २५०)। पुनः शब्द के अर्थ का सूचक अव्यय (भग ५, खवय पुं[दे] स्कन्ध, कंधा (दे २, ६७)। २-पत्र ७७५) । ४; औप)। खवय देखो खवग (सम २६; पारा १३; खह देखो ख (ठा ३, १)। खाइग देखो खाइअ = क्षायिक (सुपा ५५१)। आचा)। खयर देखो खयर (प्रौपः विपा १, १)। खाइम न [खादिम] अन्न-वजित फल, औषध खबलिअ वि [दे] कुपित, कुद्ध (दे २,७२) । खहयरी स्त्री [खचरी] १ पक्षिणी, मादा | वगैरह खाद्य चीज (सम ३६ ठा ४२; खवल्ल पुं [खवल्ल] मत्स्य-विशेष (विपा १, पक्षी । २ विद्यापरी, विद्याधर की स्त्री (ठा | औप)। ८-पत्र ८३ टी)। खाइर वि [खादिर] खदिर-वृक्ष-सम्बन्धी, खैर खवा स्त्री [क्षपा] रात्रि, रात । जल न खा । सक [खादा खाना, भोजन करना, का, कत्थई (हे १, ६७)। [जल] आवश्याय, हिम (ठा ४, ४)। खाअभक्षण करना । खाइ, खाइ, खाउ खाउय न [खाद्यक] खाद्यपदार्थ (मूलशुद्धि खविअ वि [क्षपित] १ विनाशित, ना किया (हे ४, २२८)। खंति (सुपा ३७०, महा)। गा० १७१, देवदिन्न कथा गा. ६ पछी)। हुआ (सुर ४, ५७; प्राप)। २ उद्वेजित (गा भवि. खाहिइ (हे ४, २२८)। कर्म. खजइ खाओबसम । देखो खओवसमिय (सुपा १३४)। (उव)। वकृ. खत, खायंत, खायमाण खाओवसमिअ५५१: ६४८ सम्य २३) । खव्व पुं [दे] १ वाम कर, बॉया हाथ । (करु १४, पउम २२, ७५; विपा १, १); खाओवसमिग देखो खाओवसमिअ (अज्झ २ रासभ, गधा (दे २, ७७)। 'खंता पिनंता इह जे मरंति, पुणोवि ते खंति ६८; सम्यक्त्वो ५)। खव्य वि [खवे] वामन, कुब्ज, नाटा (पान)। पिनंति रायं ! (करु १४)। कवकृ. खज्जत, खाडइ. वि [दे] प्रतिफलित, प्रतिबिम्बित खत्र्य वि [ख] लघु, थोड़ा; 'अखबगबो खज्जमाण (प उम २२, ४३: गा २४८६ (दे २, ७३)। को आसि' (सिरि ६७५)। पउम १७, ८१, ८२, ४०)। हेकृ. खाइर्ड (पि ५७३)। खाडखड पुं. [खाडखड] चौथी नरक-पृथिवी खपुर देखो कब्बुर (विक्र २८)। खाअ विख्यात प्रसिद्ध, विश्रुत (उप ३२६ का एक नरकावास (ठा ६)। खव्वुल न [दे] मुंह, मुख (दे २,६८)। ६२३; नव २७; हे २, ६०)। कित्तीय वि खाडहिला स्त्री [दे] एक प्रकार का जानवर, खस अक [दे] खिसकना, गिर पड़ना । खसइ [°कीर्तिक] यशस्वी, कीतिमान् (पउम ७, गिलहरी, गिल्ली (पराह १, १, उप पृ २०५ (पिंग)। ४८)। जस वि [यशस् ] वही अर्थ विसे ३०४ टी)। खस पुं. ब. खिस] १ अनार्य देश-विशेष, (पउम ५, ८)। खाण पुं [दे] एक म्लेच्छजाति (मृच्छ हिन्दुस्थान के उत्तर में स्थित इस नाम का खाअ वि [खादित भुक्त, भक्षित; खाउग्गि- १५२)। एक पहाड़ी मुल्क (पउम ६८ ६६) । २ पुंस्त्री. एण-(गा ६६८ भवि) । खाण न [खादन] भोजन, भक्षणः 'खाणेण Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016080
Book TitlePaia Sadda Mahannavo
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHargovinddas T Seth
PublisherMotilal Banarasidas
Publication Year1986
Total Pages1010
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size32 MB
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