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________________ २१४ आराधना कथाकोश चाहा । पर प्रियंगुलता ऐसे कैसे रास्ते पर आ जानेवाली थी। उसने तापसीसे जटा झड़वा कर ही छोड़ा । जटा झाड़ने पर सचमच छोटी-छोटी मछलियाँ उसमेंसे गिरी। सब देखकर दंग रह गये । उग्रसेनने तब जैनधर्मकी खूब तारीफ कर तापसीसे कहा-महाराज, जाइए-जाइए आपके इस भेषसे पूरा पड़े। मेरी प्रजाको आपसे हृदयके मैले साधुओंकी जरूरत नहों। तापसोको भरी सभामें अपमानित होनेसे बहुत ही नीचा देखना पड़ा। वह अपना-सा मह लिये वहाँसे अपने आश्रममें आया पर लज्जा, अपमान, आत्मग्लानिसे वह मरा जाता था। जो उसे देख पाता वही उसकी ओर अँगुली उठाकर बतलाने लगता। तब इसने यहाँका रहना छोड़ देना ही अच्छा समझ कूच कर दिया । यहाँसे यह गंगा और गंधवतोके मिलाप होनेकी जगह आया और वहीं आश्रम बनाकर रहने लगा । एक दिन जैनतत्त्वके परम जानकार वीरभद्राचार्य अपने संघको लिए इस ओर आ गये । वशिष्ठ-तापसको पंचाग्नि तप करते देख एक मुनिने अपने गुरुसे कहा-महाराज, यह तापसी तो बड़ा ही कठिन और असह्य तप करता है। आचार्य बोले-हाँ यह ठीक है कि ऐसे तपमें भी शरीरको बेहद कष्ट बिना दिये काम नहीं चलता, पर अज्ञानियोंका तप कोई प्रशंसाके लायक नहीं । भला, जिनके मनमें दया नहीं, जो संसारकी सब माया, ममता और आरम्भ-सारम्भ छोड़-छोड़कर योगी हुए और फिर वे ऐसा दयाहीन, जिसमें हजारों लाखों जीव रोज-रोज जलते हैं, तप करें तो इससे और अधिक दुःखको बात कौन होगी। वशिष्ठके कानों में भी यह आवाज गई। वह गुस्सा होकर आचार्यके पास आया और बोला-आपने मुझे अज्ञानी कहा, यह क्यों ? मुझमें आपने क्या अज्ञानता देखी, बतलाइए ? आचार्यने कहा-भाई, गुस्सा मत हो। तुम्हें लक्षकर तो मैंने कोई बात नहीं कही है । फिर क्यों इतना गुस्सा करते हो ? मेरो धारणा तो ऐसे तप करनेवाले सभी तापसोंके सम्बन्धमें है कि वे बेचारे अज्ञानसे ठगे जाकर हो ऐसे हिंसामय तपको तप समझते हैं । यह तप नहीं है, किन्तु जीवोंका होम करना है। और जो तुम यह कहते हो, कि मुझे आपने अज्ञानी क्यों बतलाया, तो अच्छा एक बात तुम ही बतलाओ कि तुम्हारे गुरु, जो सदा ऐसा तप किया करते थे, मरकर तपके फलसे कहाँ पैदा हुए हैं ? तापस बोला-हाँ, क्यों नहीं कहूँगा ? मेरे गुरुजी स्वर्गमें गये हैं। वोरभद्राचार्यने कहा-नहीं तुम्हें इसकी मालूम हो नहीं हो सकती । सुनो, मैं बतलाता हूँ कि तुम्हारे गुरुकी मरे बाद क्या दशा हुई, आचार्यने अवधिज्ञान जोड़कर कहा-तुम्हारे गुरु स्वर्गमें नहीं गये, किन्तु साँप हुये हैं और इस लकड़े Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016063
Book TitleAradhana Katha kosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdaylal Kasliwal
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year2005
Total Pages472
LanguageHindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size21 MB
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