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________________ मान्यखेट मार्गणा मान्यखेट-निजाम हैदराबाद राज्यके अन्तर्गत शोलापुरसे १० मील दक्षिण पूर्व में स्थित वर्तमानका मलखेडा ग्राम (क पा.१/प्र.७३/प.महेन्द्र)। मापिकी-Mensuration (ज.प्र./प्र. १०८ ) । माय-स्व. स्तोत्र/टी./१४१/२६७ माय' प्रमाण केवलज्ञानलक्षणं आगमस्वरूप वा। -माय अर्थात् प्रमाण जिसका लक्षण केवलज्ञान या आगमस्वरूप है। मायास. सि./4/१६/३३४/२ आत्मन' कुटिलभावो माया निकृति । -आत्मा का कुटिल भाव माया है। इसका दूसरा नाम निकृति ( या वचना) है। (स. सि/७/१०/३५६/८), (रा. वा/६/१६/१/५२६/६,७/१८/२/५४५/१४ ); (ध, १/१,१,१११/३४६/७); (ध १,६-१,२३/४१/४)। रा. वा./८/8/1/५७४/३१ परातिसंधानतयोपहितकौटिव्यप्राय' प्रणिधिर्माया प्रत्यासन्नवंशपर्वोपचितमूलमेषश ग-गोमूत्रिकाऽवलेखनीसदृशी चतुर्विधा। -दूसरेको ठगनेके लिए जो कुटिलता या छल आदि किये जाते है वह माया है। यह बाँसको गठीली जड़, मेढेका सींग, गायके मूत्रकी वक्र रेखा और लेखनीके समान चार प्रकार की है। (और भी दे० कषाय/३)। घ, १२/४,२,८,८/२८३/७ स्वहृदयप्रच्छादार्थमनुष्ठानं माया । - अपने हृदयके विचारको छपानेकी जो चेष्टा की जाती है उसे माया कहते है। नि सा/ता वृ/११२ गुप्तपापतो माया। -- गुप्त पापसे माया होती है। द्र. स./टो /४२/१८३/६ रागात् परकलत्रादिवाञ्छारूपं, द्वेषात परबध बन्धच्छेदादिवाञ्छारूप च मदीयापध्यानं कोऽपि न जानातीति मत्वा स्वशुद्धात्मभावनासमुत्पन्नसदानन्दै कलक्षणमुखामृतरसनिर्मलजलेन चित्त शुद्धिमकुर्वाण' सन्नयं जीवो बहिरङ्गबकवेशेन यल्लोकरञ्जना करोति तन्मायाशक्य भण्यते । -रागके उदयसे परस्त्री आदिमें बान्छारूप और द्वेषसे अन्य जीवों के मारने, बॉधने अथवा छेदनेरूप जो मेरा दुान बुरा परिणाम है, उसको कोई भी नहीं जानता है, ऐसा मानकर निज शुद्धात्म भावनासे उत्पन्न, निरन्तर आनन्दरूप एक लक्षणका धारक जो सुख-अमृतरसरूपी निर्मल जलसे अपने चित्तकी शुद्धिको न करता हुआ, यह जीव बाहरमें बगुले जैसे वेषको धारण कर जो लोकोको प्रसन्न करता है वह मायाशल्य कहलाती है। २. मायाके भेद व उनके लक्षण भ. आ./वि./२५/१०/३ माया पञ्च विकल्पा-निकृति , उपाधि, साति- प्रयोगः प्रणिधि.. प्रतिकचन मिति । अतिसधानकुशलता धने कार्ये वा कृताभिलाषस्य वञ्चना निकृति. उच्यते। सद्भाव प्रच्छाद्य धर्मव्याजेन स्तन्यादिदोषे प्रवृत्तिरुपधिस ज्ञिता माया । अर्थेषु विसवाद. स्वहस्तनिक्षिप्तद्रव्यापहरण, दूषणं, प्रशसा, बा सातिप्रयोग । प्रतिरूपद्रव्यमानकरणानि, ऊनातिरिक्तमान, सयोजनया द्रव्यविनाशनमिति प्रणिधिमाया। आलोचनं कुर्वतो दोषविनिगूहन प्रतिकुञ्चनमाया। -मायाके पाँच प्रकार है-निकृति, उपधि, सातिप्रयोग, प्रणिधि और प्रतिकुंचन । धनके विषयमें अथवा किसी कार्यके विषयमें जिसको अभिलाषा उत्पन्न हुई है, ऐसे मनुष्य का जो फंसानेका चातुर्य उसको, निकृति कहते है। अच्छे परिणामक ढक्कर धर्म के निमित्तसे चोरी आदि दोषोमें प्रवृत्ति वरना उपधि सज्ञक माया है। धनके विषयमें असत्य बोलना, किसीकी धरोहरका कुछ भाग हरण कर लेना, दूषण लगाना अथवा प्रशमा करना सातिप्रयोग माया है। हीनाधिक कीमतकी सदृश वस्तुएँ आपसमे मिलाना, तोल और मापके सेर, पसेरी वगैरह साधन पदार्थ क' -ज्यादा रखकर लेन-देन करना, सच्चे और झूठे पदार्थ आपसमे मिलाना, यह सब प्रणिधि माया है। आलोचना करते समय अपने दोष छिपाना यह प्रतिकुचन माया है। * अन्य सम्बन्धित विषय १. माया कषाय सम्बन्धित विषय । --दे० कषाय। २. आहारका एक दोष । -दे० आहार/II/४/४| ३. वसतिकाका एक दोष । -दे० वसतिका। ४. जीवको मायी कहनेकी विवक्षा। दे० जीव/१/३। ५. मायाकी अनिष्टता। -दे० आयु/३/५। माया क्रिया-दे० क्रिया/३/२। मायागता चूलिका-दे० श्रुतज्ञान/IIII मायावाद-दे. वेदान्त ।। मायूरी-एक विद्याधर विद्या-दे० विद्या। मार-चौथे नरकका द्वितीय पटले-दे० नरक/५/११ । मारणान्तिक समुद्घात-दे० मरण/ 1 मारसिंह-आप गंगवशीय राजा राजमलके पूर्वाधिकारी थे और आचार्य अजितसेनके शिष्य थे। राजा राजमल के अनुसार आपका समय-वि. सं. १०२०-१०४० (ई. १६३-६८३) आता है। मारोच-प. पु./०८/८१/८२--रावणका मन्त्री था। रावणको युद्धसे रोकनेके लिए इसने बहुत प्रयत्न किया और रावणकी मृत्युके पश्चात दीक्षा धारण कर ली। मारुती धारणा-दे० वायु । माग-ध, १३/५,६,१०/२८७/६ मृग्यतेऽनेनेति मार्ग' पन्था'। स पञ्चविध'--नरगतिमार्ग , तिर्यग्गतिमार्ग' मनुष्यगतिमार्ग', देवगतिमार्गः, मोक्षगतिमार्गश्चेति । तत्र एकैको मार्गोऽनेकविध कृमिकीटादिभेदभिन्नत्वात् ।-जिसके द्वारा मार्गण किया जाता है वह मार्ग अर्थात पथ कहलाता है। वह पॉच प्रकारका है--नरकगतिमार्ग, तियंचगतिमार्ग, मनुष्यगतिमार्ग, देवगतिमार्ग और मोक्षगतिमार्ग। उनमें से एक एक मार्ग कृमि व कीट आदि के भेदसे अनेक प्रकारका है । * उत्सर्ग व अपवाद मागे-दे० अपवाद । * मोक्षमार्ग-दे० मोक्षमार्ग । मागंणादे. ऊहा-ईहा. ऊहा. अपोहा. मार्गणा. गवेषणा और मोमासा ये ___ एकार्थवाचक नाम है। प. सं/प्रा /१/५६ जाहि व जासु व जीवा मग्गिजंते जहा तहा दिट्ठा । ताओ चोद्दस जाणे सुदणाणेण मग्गणाओ त्ति । - जिन-प्रवचनदष्ट जीव जिन भावोके द्वारा अथवा जिन पर्यायोमें अनुमार्गण क्येि जाते है अर्थात् खोजे जाते है, उन्हे मार्गणा कहते है। जीवोका अन्वेषण करनेवाली ऐसी मार्गणाएँ श्रुतज्ञान में १४ कही गयी है । (ध. १/१,१, ४/गा ८३/१३२), (गो जी././१४१/३५४)। ध १/१,१,२/१३१/३ चतुर्दशाना जीवस्थानाना चतुर्दशगुणस्थानामित्यर्थः। तेषा मार्गणा गवेषणमन्वेषणमित्यर्थ । चतुर्दश जीवसमासा' सदादिविशिष्टा' मार्यन्तेऽस्मिन्ननेन वेति मार्गणा । चौदह जीव समासोसे यहाँ पर चौदह गुणस्थान विवक्षित है। मार्गणा गवेषणा और अन्वेषण ये तीनो शब्द एकार्थवाची है। सत् संख्या आदि अनुयागद्वारोसे युक्त चौदह जीवसमास जिसमें या जिसके द्वारा खोजे जाते है, उसे मार्गणा कहते है। (ध ७/२,१,३/७/८)। जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.016010
Book TitleJainendra Siddhanta kosha Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinendra Varni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2002
Total Pages639
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size24 MB
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