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________________ मंगल १/१०१०१/०६/३ कतिविधं महल महलसामान्यातदेकविध मुख्यमुपमेतद्विविधस्, सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रमेशव त्रिविध मङ्गलम् धर्म सिद्धसाध्वर्हद्वभेदाच्चतुर्विधम् ज्ञानदर्शन त्रिगुप्तिभेदात् 'मो जिला इयादिनानेकविध मा १. मंगल कितने प्रकारका है । मंगल सामान्यकी अपेक्षा मगल एक प्रकारका है । ३. मुख्य और गौणके भेदसे दो प्रकारका है । ( प. का./ता वृ./ २/५/६४ सम्यग्दर्शनसम्मान और सम्यरूचारित्र के भेदसे तीन प्रकारका है । ५. धर्म, सिद्ध, साधु और अर्हन्तके भेदसे चार प्रकारका है । ६. ज्ञान, दर्शन और तीन गुप्तिके भेदसे पाँच प्रकारका है । ७. अथवा 'जिनेन्द्रदेवको नमस्कार हो' इत्यादि रूपसे अनेक प्रकारका है । . १/१.१.१/४९/५ तच्च मंगल दुविहं मिद्धमनिमि८ि, वह मंगल दो प्रकारका है, निबद्धमगल और अनिबद्ध मंगल । (पं का. / ता. वृ./१/५/२३) । २४१ = ३. नाम स्थापनादि मंगलके लक्षण ति, प./१/१६-२७ अरहाणं सिद्धाण आइरियउज्झियाइ साहूणं । नामाहं माममगमुट्ठि बीयराएहि ११६ वणमगलमे अि माकट्टिमाणि जिजा विषय साहूदेहाणि मग | २० | गुणपरिदासणं परिणितामणं केवलस्स णाणस्स । उपपत्ती इयपहुदी बहुभेयं खेतमगतय | २१| एस्स उदाहरणं पाषाणगरुज्यतनं पादी । आउट्ठहत्यपहूदी पणुवीसम्भहियपणसयधणि ॥ २२॥ देवअवइिकेवलणाणावर गदेसो थापि गमेस अष्पष्पदेसगदतोयपुरणापुण्णा | २३ | विस्साण लोयाणं होदि पदेसा वि मंगलं खेसं । जेस्सिकाले वाणादिमंगलं परिणमति । २४ परिि नाग्भवणि दिव्यखादी पावलगासनादो पण कालमगलं भा० ३-३१ २५ एवं अय हवेदितं कालम जिगमहिमासंबंध दोरीयहूदी जी | २६ मगलपाहि उपलस्त्रियजीवदव्वमेत्त च । भावं मगलमेदं ॥२७॥ वीतराग भगवान्के अर्हन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु इन नामोको नाममगल कहा है | १६ | जिन भगवा के जो अकृत्रिम और कृत्रिम प्रतिबिम्ब है, वे सब स्थापना मंगल है। तथा आचार्य उपाध्याय साधुके शरीर अन्य मंगल है | २०| गुणपरिणत आसन क्षेत्र अर्थात जहॉपर योगासन, वीरासन आदि विविध आसनोसे तदनुकूल ध्यानाभ्यास आदि अनेक गुण प्राप्त किये गये हों ऐसा क्षेत्र, दीक्षाका क्षेत्र, केवलज्ञानोत्पत्तिका क्षेत्र इत्यादि रूपसे क्षेत्र मंगल बहुत प्रकारका है ||२१| इस क्षेत्रमगलके उदाहरण पावानगर ऊर्जयन्त ( गिरनार पर्वत) और चम्पापुर आदि है अथवा साढ़े तीन हादसे लेकर १२२ धनुषप्रमाण शरीर में स्थित और केवलज्ञानसे व्याप्त आकाशप्रदेशीको क्षेत्रमगल समझना चाहिए। अथवा जगच्छ्र ेणीके धनमात्र अर्थात् लोकप्रमाण आत्मा प्रदेश लोकसमुद्रात द्वारा पूरित सभी (ऊर्ध्व, अधो व तिर्यक् ) लोकोके प्रदेश भी क्षेत्र मंगल है | २२-२४ | जिस कालमें जोव केवलज्ञानादि रूप मगलपर्यायको प्राप्त करता है उसको तथा दीक्षाकाल केवलज्ञानके उद्भवका काल. और निर्वाणकाल ये सब पापरूपी मलके गलानेका कारण होनेसे कालमंगल कहा गया है । २४-२५| इस प्रकार जिनमहिमासे सम्बन्ध रखनेवाला कालमगल अनेक भेदरूप है, जैसे नन्दोश्वर द्वीप सम्बन्धी पर्व आदि । २५-२६ । वर्तमान में मंगलरूप पर्यायोसे परिणत जो शुद्ध जीव द्रव्य है अर्थात् पचपरमेष्ठकी अत्माएँ वह भावमंगल है | २० (ध. १ / १,१.१ / २८-२१), (विशेष दे० निक्षेप) | दे० निक्षेप / ५ / ७ (सरसो, पूर्णकलश आदि अचित्त बालकन्या व उत्तम घोडा आदि सचित्त पदार्थ सहित कन्या आदि मित्र पदार्थ ये सब सौकिक नो Jain Education International पदार्थ, अथवा अथवा अलंकार पतिरिक्त २. मंगल निर्देश व तद्गत शंकाएँ द्रव्य मंगल है। पच परमेष्ठीका अनादिअनन्त जीवद्रव्य, कृत्रिमाकृत्रिम चैत्यालय तथा साम सहित चैय्यालयादि ये क्रम सचित्त अचित्त व मिश्र लोकोत्तर नोकर्म तद्वयतिरिक्त द्रव्य मंगल है। जीवन तीर्थंकर प्रांत नामकर्म कर्मतिरिक्त नोआगम द्रव्यमगल है ) । ४. निबद्धानिबद्धादि मंगलों के लक्षण घ. १/१.१.१/४/६ वय निम' ग्राम, जो सुत्तस्सादोए सुचकसारेण णिबद्धदेवदाणमाक्कारो तं निबद्धमगल । जो सुत्तस्सादीए सत्तारेण कयदेवदाणमोक्कारो तमणिबद्धमगल । जो ग्रन्थके आदिमे ग्रन्थकारके द्वारा इष्टदेवता नमस्कार निबद्ध कर दिया जाता है अर्थात् श्लोकादि रूप में रचकर लिख दिया जाता है, उसे निबद्ध मंगल कहते है । और जो ग्रन्थ के आदिमे ग्रन्थकार द्वारा देवताको नमस्कार किया जाता है [अर्थात् लिपिबद्ध नही किया जाता (ध. २/ प्र.३४) बल्कि शास्त्र लिखना या बांधना प्रारम्भ करते समय मन, वचन, कायसे जो नमस्कार किया जाता है ] उसे अनिबद्ध मगल कहते है । (पं. का./ता.वृ/२/५/२४) पं.का./ता.वृ/९/२०/९० तत्र मुख्यमइले कभ्यते, आदी मध्येऽवसाने च मङ्गलं भाषित बुधै । तज्जनेन्द्रगुणस्तोत्र तदविघ्नप्रसिद्धये |१| अमुख्यमङ्गलं कथ्यते - सिद्धत्य पुण्णकुभो बंदणमाला य पुडुरं छत्त । सेदो वण्णो आदस्स णाय कण्णा य जत्तस्सो |१| = ज्ञानियों द्वारा शास्त्र के आदि मध्य व अन्तमें विघ्न निवारणके लिए जो जिनेन्द्र देवका गुणस्तवन किया जाता है, वह मुख्य मगल है और पीली सरसो, पूर्ण कलश, वन्दनमाला, छत्र, श्वेत वर्ण, दर्पण, उत्तम अमुख्य मंगल है | ( इन्हे मगल क्यों कहा जाता है, इसके लिए देखा मगन /२/८) । २. मंगल निर्देश व तद्गत शंकाऍ १. मंगलके छह अधिकार घ. १ / १,१,१ / ३६ / ६ मंगल म्हि छ अहियाराऍ दडा बत्तव्या भवंति । तं जहा, मगलं मगलकत्ता मंगलकरणीय मगलोवायो मंगल विहाण मगलफलमिदि । एवेसि छह पि अत्थो उच्चदे | मगलत्थो पुत्ती । मगलकता चोदस्सविज्जाद्वामपारओ आहरियो मंगलकरणीय भज गोमायो तिरयकसाहवाणि मगतविहान एयविहादि पुव्युत । मगलके विषय में छह अधिकारी द्वारा दण्डकोका कथन करना चाहिए। वे इस प्रकार है- १. मंगल, २. मंगलकर्ता, ३. मंगल करने योग्य, ४. मंगलका उपाय ५. मगलके भेद, और ६ मंगलका फल है । अब इन छह अधिकारोका अर्थ कहते है । मगलका क्षण तो पहले कहा जा चुका है ( ० मंगल / १४१) चौदह विद्यास्थानोके पारगामी आचार्य परमेष्ठी (यहाँ भूतबली आचार्य) मंगलकर्ता है। भव्यजन मगल करने योग्य है । रत्नत्रयकी साधक सामग्री (आत्माधीनता व मन वचन कायकी एकाग्रता आदि) मंगलका उपाय है। एक प्रकारका, दो प्रकारका आदि रूपसे मगल के भेद पहले कह आये है । (दे० मगल / १ / २ ) । मगलका फल आगे कहेंगे (दे० मंगल /२/२)। २. मंगळका सामान्य फल व महिमा दि. १ / २ / ३०-३१ णादि विग्ध भेददि मंहो वृट्ठा सुराण संबंति । इही अत्यो सम्म जिगणामग्गणमेरोण 1201 सत्धादिमन्भजनसामसु जितोसमचारो पासइ पिरसाइ निरधाई रवि व्य तिमिराइ |१| जिन भगवान् के नामके ग्रहण करनेमात्र से विघ्न नष्ट हो जाते है, पाप खण्डित होता है, दुष्ट देव लाँघ नही सकते अर्थात् किसी प्रकारका उपद्रव नहीं कर सकते और इष्ट अर्थ की जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016010
Book TitleJainendra Siddhanta kosha Part 3
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinendra Varni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2002
Total Pages639
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size24 MB
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