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________________ હનુમા" अनुभाग स्पर्धकोंके अविभाग प्रतिच्छेदों की संख्या यहाँ पायी जाती है। और बहुत अविभाग प्रतिच्छेदोंमें स्तोक अविभाग प्रतिच्छेदोका होना असभव नहीं है, क्योंकि एक आदि सख्याके बिना अविभाग प्रतिच्हेदों की संख्या बहुत नहीं हो सकती। प्रश्न-मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अनुभागसत्कर्म चतु'स्थानिक है. ऐसा कहनेपर मिथ्यात्वके एक उत्कृष्ट स्पर्धकका ही ग्रहण कैसे होता है । उत्तर-नहीं, क्योकि मिथ्यात्वके उत्कृष्ट स्पर्धककी अन्तिम वर्गणामें एक परमाणुके द्वारा धारण किये गये अनन्त अविभाग प्रतिच्छेदोंसे निष्पन्न अनन्त स्पर्धकोंकी उत्कृष्ट अनुभाग सत्कर्म संज्ञा है। ८. मानकषायकी शक्तियोके दृष्टान्त मिथ्यात्वादि प्रकृतियोके अनुभागोंमे कैसे लागू हो सकते है क. पा./५/४-२२/११६६/१३६/१ लदा दारु अठ्ठि-सेलसण्णाओ माणाणुभागफद्दयाण लयाओ कधं मिच्छत्तम्मि पयटटंति । ण, माणम्मि अवट्ठिदचदुहं सपाणमणुभागाविभागपलिच्छेदेहि समाणत्त पेविखटूण पय डिविरुदमिच्छत्तादिफद्दएसु बिपबुत्तीए वि रोहाभावादो। प्रश्न-लता, दारु, अस्थि और शैल संज्ञाएं मान कषायके अनुभाग स्पर्धकों में की गयी है। (दे. कषाय ३), ऐसी दशामें के संज्ञाएँ मिथ्यात्व में कैसे प्रवृत्त हो सकती है। उत्तर-नहीं, क्योंकि. मानकषाय और मिथ्यात्वके अनुभागके अविभागी पतिच्छेदोके परस्पर में समानता देखकर मानकषायमे होनेवाली चारो संज्ञाओ की मानकषायसे विरुद्ध प्रकृतिवाले मिथ्यात्वादि (सर्व कर्मों के अनुभाग) स्पर्धकोमें भी प्रवृत्ति होने में कोई विरोध नही है । ५. अनुभाग बन्ध सम्बन्धी कुछ नियम व प्ररूपणाएँ १ प्रकृतियोंके अनुभागकी तरतमता सम्बन्धी सामान्य नियम घ. १२/४.२,७,६५/५५/४ - महाबिसयस्स अणुभागो महल्लो होदि, थोवविसयस्स अणुभागो थोवो होदि। खवगसेडीए देसधादिबंधकरणे जस्स पुख्यमेव अणुभागबधो देसघादी जादो तस्साणुभागो थोवो। जस्स पच्छा जादो तस्स बहुओ । महान् विषयवाली प्रकृतिका अनुभाग महान होता है और अल्प विषयवाली प्रकृतिका अनुभाग अल्प होता है। यथा-क्षपक श्रेणी में देशघाती बन्धकरण के समय जिसका अनुभाग बन्ध पहले ही देशघाती हो गया है उसका अनुभाग स्तोक होता है और जिसका अनुभागबन्ध पीछे देशघाती होता है उसका अनुभाग बहुत होता है । (ध १२/४,२,७,१२४/६६/१५)। . प्रकृति विशेषोंमें अनुभागकी तरतमताका निर्देश १ ज्ञानावरण व दर्शनावरणके अनुभाग परस्पर समान होते है प.ख./१२/४,२,७/४३/३३/२ णाणावरणीय-दसणावरणीयवेग्रणाभावदो जहणियाओ दो वि तुल्लाओ अणं तगुणाओ-भावकी अपेक्षा ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीयकी जघन्य बेदनाएँ दोनो ही परस्पर तुल्य होकर अनन्तगुणी है। २. केवलज्ञान, दर्शनावरण, असाता व अन्तरायके अनुभाग परस्पर समान है पख/१२/४,२,७/सू ७६/४६/६ केवलणाणावरणीयं केवलदसणावरणीय असाद वेदणीय वी रियतराइयं च चत्तारि वि तुल्लाणि अण तगुणहीणाणि ७६॥ केवल ज्ञानावरणीय, केवलदर्शनावरणीय, असातावेदनीय और वीर्यान्तराय ये चारों हो प्रकृतियाँ तुल्य होकर उससे अनंतगुणी हैं ॥७६॥ ३. तिर्यंचायुसे मनुष्यायुका अनुभाग अनन्तगुणा है प.१२/४,२,१३,१६२/४३१/१२ सहावदो चेव तिरिक्रबाउआणुभागादो मणुसाउअभावस्स अण तगुणत्ता स्वभाव से ही तिथंचायुके अनुभागसे मनुष्यायुका भाव अनन्त गुणा है। ३. जघन्य व उत्कृष्ट अनुभागके बन्धकों सम्बन्धी नियम १. अघातिया कर्मोंका उत्कृष्ट अनुभाग सम्यग्दृष्टिको ही बन्धता है, मिथ्यादृष्टिको नही ध. १२/४,२,१३/२५०/४५६/४ ण च मिच्छाइट्ठीसु अधादिकम्माणमुक्कस्सभावो अत्थि सम्माइट्ठोस णियमिदउक्कस्साणुभागस्स मिच्छइठीसु सभव विरोहादो। -मिथ्यादृष्टि जीवोंमें अधातिकमोंका उत्कृष्ट भाव स भव नहीं है, क्योकि सम्यग्दृष्टि जीवोमें नियमसे पाये जानेवाले अघाति कर्मोके उत्कृष्ट अनुभागके मिथ्यादृष्टि जीवोंमें होनेका विरोध है। ध १२/४,२,१३,२५६/४५६/२ असंजदसम्मादिठ्ठिणा मिच्छादिछिणा बा बद्धस्स देवाउअ पेखिदूण अप्पसत्थस्स उकस्सत्तविरोहादो। तेण अणंतगुणहीणा ।- सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टिके द्वारा बान्धी गयी मनुष्यायु ~ कि देवायुकी अपेक्षा अप्रशस्त है, अतएव उसके उत्कृष्ट होनेका विरोध है। इसी कारण वह अनन्तगुणी हीन है। २. गोत्रकर्मका जघन्य अनुभागबन्ध तेज व वातकायिकों___ मे ही सम्भव है ध. १२/४,२,१३,२०४/४४१/८ बादरतेउक्काइयपज्जत्तएस जादजहण्णाणुभागेण सह अण्णत्थ उप्पत्तीए अभावादो। जदि अण्णत्य उप्परदि तो णियमा अण तगुणवढीए वडिढद। चेव उपज्जदि ण अण्णहा। - बादरतेजकायिक व वायुकायिक पर्याप्तक जीवोंमें उत्पन्न जघन्य अनुभागके साथ अन्य जीवोमें उत्पन्न होना सम्भव नही। यदि वह अन्य जीवामें उत्पन्न होता है तो नियमसे वह अनन्तगुण वृद्धिसे वृद्धिको प्राप्त होकर ही उत्पन्न होता है, अन्य प्रकारसे नहीं। ४. प्रकृतियोंके जघन्य व उत्कृष्ट अनुभाग बन्धकोंकी प्ररूपणा प्रमाण-१. (पं.स.प्रा/४/४६०-४८२) (दे स्थिति ६), (क.पा/४-२२/ ६२२६-२७६/१५१-१८५/केवल मोहनीय कर्म विषयक)। सकेत-अनि०८-अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें उस प्रकृतिकी मन्धव्युच्छित्ति से पहला समय; अपू० = अपूर्वकरण गुणस्थानमें उस प्रकृतिकी बन्धव्युच्छित्तिसे पहला समय; अप्र० - अप्रमत्तसं यत, अवि० - अविरतसम्यग्दृष्टि, क्षपक०-क्षपकश्रेणी, चतु०-चतुर्गतिके जीव; ति०= तिर्यच, तीघ्र० -- तीन सक्लेश या कषाययुक्त जीव, देशदेशस यत, ना० नारकी, प्र०-प्रमत्तसयत, मध्य० मध्य परिणामों युक्त जीव, मनु०-मनुष्य, मि०-मिथ्यादृष्टि, विशु०- अत्यन्त विशुद्ध परिणामयुक्त जीव; सम्य०-सम्यग्दृष्टि; सा० मि०-सातिशय मिथ्याष्टिः सू० सा०-सूक्ष्मसाम्परायका चरम समय। नाम प्रकृति | उस्कृष्ट अनुभाग | जघन्य अनुभाग ज्ञानावरणीय तीब० चतु० मि० | सू० सा० दर्शनावरणीय ४ निद्रा, प्रचला अपू० निद्रा निद्रा,प्रचला प्रचला सा०मि०/चरम स्त्यानगृद्धि अन्तराय सू० सा० मिथ्यात्व सा०मि०/चरम अनन्तान बन्धी चतु० अप्रत्याख्यान चतु० प्र०सन्मुख अवि० प्रत्याख्यान चतु० प्र० सन्मुख देश० संज्वलन चतु० অলি हास्य, रति अरति, शोक अप्र० सन्मुख प्र० भय, जुगुप्सा | अपू० जैनेन्द्र सिद्धान्त कोश Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.016008
Book TitleJainendra Siddhanta kosha Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinendra Varni
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2003
Total Pages506
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationDictionary & Dictionary
File Size18 MB
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