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________________ There are also phases of matter which are four in number viz., räpassa upacaya (growth of matter), rapassa santati (continuity of matter), rūpissa jarata (decay of matter) and ripassa aniccata (inpermanence of matter). Obviously these four phases indicate growth of matter, its continuity, its decaying state and its complete annihilation. These phases of matter clearly point out that there is no justification for our being attached to any object for true happiness. They rise only in order to be annihilated. When they are in a constant state of flux, how can they give true happiness? The last item of upada ripa is äkäsa (element of space). It is äkäsa dhātu. which gives room to all material things for movement. It is regarded as a bounded space. Thus, it is clear that the early Buddhists have defined matter more from the ethical point of view than from the metaphysical point of view. In spite of this bias, however, the metaphysical point of view is also not blurred and indistinct. References लेखसार 1. Sanyutta Nikaya, 2, PP. 375 2. Ibid, 2, PP. 262 3. Ibid, 4. Ibid, 5. Ibid, 3, PP. 389 2, PP. 262 2, PP. 261. प्रारंभिक बौद्ध दर्शन में पदार्थ को धारणा महात्मा बुद्ध एक व्यावहारिक दार्शनिक थे। से छुटकारा पाने की बात कही । यह तृष्णा विभिन्न ये पदार्थ संयोजन नहीं, अपितु संयोजनीय हैं। इन मूल प्रकृति का विवरण दिया है। Jain Education International प्रो० अंगराज चौधरी, नवनालन्दा महाविहार उन्होंने धर्म के महान् उद्देश्यों में तृष्णाजनित दुःख सांसारिक पदार्थों के प्रति ममत्व के कारण होती हैं । संयोजनीयों से ममत्व हटाने के लिये ही बुद्ध ने उनकी बुद्ध धर्म में पदार्थों को 'रूप' शब्द से अभिहित किया जाता है। संयुक्तनिकाय में रूप को प्रतीत्य समुत्पन्न, संख्यात, अनित्य, व्यय-क्षय धर्मी और निरोध धर्मात्मक बताया गया है। इसे मार, रोग, असार, शून्य आदि नामों से भी कहा जाता है। इसकी प्रकृति बुलबुले ( फेनपिंड) के समान अनित्य होती है। रूप की अनित्यता का यह वर्णन उससे ममत्वभाव उत्पन्न न होने देने के लिये ही किया गया है । बुद्ध न तो वेदान्तियों के समान जगत् को असत् मानते हैं और न ही वे इसे मानसिक प्रक्रिया मानते हैं । वे इसका स्वतंत्र अस्तित्व मानते हैं। इस जगत में मन और पदार्थ अंधे और लंगड़े के समान 432- For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012048
Book TitleKailashchandra Shastri Abhinandan Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBabulal Jain
PublisherKailashchandra Shastri Abhinandan Granth Prakashan Samiti Rewa MP
Publication Year1980
Total Pages630
LanguageHindi, English, Sanskrit
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size17 MB
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