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________________ - यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्य : जैन-धर्म करना, जिससे उन्हें मानसिक एवं शारीरिक पीड़ा न पहुँचे। १०. तीर्थंकरों से संबंधित विवरण का विकास ९. वैयाकृत्यकरण - गुणीजनों अथवा ऐसे लोगों की, जिन्हें तीर्थंकरों की संख्या एवं उनके जीवनवृत्त आदि को लेकर सहायता की अपेक्षा है, सेवा करना। सामान्यतया जैनसाहित्य में बहुत कुछ लिखा गया किन्तु यदि १०-१३. चतुःभक्ति - अरिहंत, आचार्य, बहुश्रुत और शास्त्र इन हम ग्रंथों पर कालक्रम की दृष्टि से विचार करें, तो प्राचीनतम चारों में शुद्ध निष्ठापूर्वक अनुराग रखना। जैन-आगम आचारांग में महावीर के संक्षिप्त जीवनवृत्त को छोड़कर हमें अन्य तीर्थंकरों के संदर्भ में कोई जानकारी नहीं १४.आवश्यकापरिहाण - सामायिक आदि षडावश्यकों के मिलती। यद्यपि आचारांग सामान्यरूप से भूतत्कालिक, अनुष्ठान सदैव करते रहना। वर्तमानकालिक और भविष्यत्कालिक अरिहंतों का बिना किसी १५.मोक्षमार्ग-प्रभावना - अभिमान को त्यागकर मोक्षमार्ग की नाम के निर्देश अवश्य करता है। रचनाकाल की दृष्टि से इसके साधना करना तथा दूसरों को उस मार्ग का उपदेश देना। पश्चात कल्पसत्र का क्रम आता है, उसमें महावीर के जीवनवृत्त १६. प्रवचनवात्सल्य - जैसे गाय बछड़े पर स्नेह रखती है, वैसे के साथ-साथ पार्श्व, अरिष्टनेमि और ऋषभदेव के संबंध में भी ही सहधर्मियों पर निष्काम स्नेह रखना। किंचित् विवरण मिलता है, शेष तीर्थंकरों का केवल नामनिर्देश श्वेताम्बर परम्परा में ज्ञाताधर्मकथा के आधार पर तीर्थंकर ही है। इसके पश्चात् तीर्थंकरों के संबंध में जानकारी देने वाले नामकर्म के उपार्जन हेतु निम्नांकित (२०) बीस साधनाओं ___ ग्रंथों में समवायांग और आवश्यकनियुक्ति का काल आता है। को आवश्यक माना गया है३८ - समवायांग और आवश्यकनियुक्ति संक्षिप्त शैली में ही सही किन्तु वर्तमान, भूतकालिक और भविष्यत्कालिक तीर्थंकरों के १-७. अरिहंत, सिद्ध, प्रवचन, गुरु, स्थविर, बहुश्रुत एवं तपस्वी । संबंध में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं। दिगम्बर परम्परा में इन सातों के प्रति वात्सल्य-भाव रखना। ऐसा ही विवरण यतिवृषभ की तिलोयपण्णति में मिलता है। ८. अनवरत ज्ञानाभ्यास करना। श्वेताम्बर आगम-ग्रंथ जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति ऋषभ के संबंध में और ९. जीवादि पदार्थों के प्रति यथार्थ श्रद्धारूप शुद्ध सम्यक्त्व का होना। ज्ञाताधर्मकथा मल्लि के संबंध में विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हैं। तिलोयपण्णति के बाद दिगम्बर-परम्परा में पुराणों का क्रम १०. गुरुजनों का आदर करना। आता है। पुराणों में तीर्थंकरों के जीवनवृत्त के संबंध में विपुल ११.प्रायश्चित्त एवं प्रतिक्रमण द्वारा अपने अपराधों की सामग्री उपलब्ध है। श्वेताम्बर-परम्परा में स्थानांग, समवायांग, क्षमायाचना करना। कल्पसूत्र, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, आवश्यकनिर्मुक्ति, १२. अहिंसादि व्रतों का अतिचार-रहित योग्य रीति से पालन करना। विशेषावश्यकभाष्य, आवश्यकचूर्णि, चउपन्नमहापुरिसचरियं एवं त्रिषष्टिशलाका-पुरुषचरित्र और कल्पसूत्र पर लिखी गई परवर्ती १३. पापों की उपेक्षा करते हुए वैराग्यभाव धारण करना। टीकाएँ तीर्थंकरों -का विवरण देने वाले महत्त्वपूर्ण ग्रंथ हैं। १४. बाह्य एवं आभ्यन्तर तप करना। समवायांग में उपलब्ध विवरण १५. यथाशक्ति त्यागवृत्ति को अपनाना। ऐसा लगता है कि तीर्थंकर-संबंधी विवरणों में समय१६. साधुजनों की सेवा करना। समय पर वृद्धि होती रही है। हमारी जानकारी में २४ तीर्थंकरों १७. समता भाव रखना। की अवधारणा और तत्संबंधी विवरण सर्वप्रथम श्वेताम्बर - १८. ज्ञान-शक्ति को निरंतर बढ़ाते रहना। परम्परा में समवायांग और विमलसूरि के पउमचरियं में प्राप्त होता है। यद्यपि स्थानांग एवं समवायांग की गणना अंग-आगमों १९. आगमों में श्रद्धा रखना। में की जाती है किन्तु समवायांग में २४ तीर्थंकर संबंधी जो २०. जिन-प्रवचन का प्रकाश रखना। विवरण है, वह उसके परिशिष्ट के रूप में है और ऐसा लगता है Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.012036
Book TitleYatindrasuri Diksha Shatabdi Samrak Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinprabhvijay
PublisherSaudharmbruhat Tapagacchiya Shwetambar Shree Sangh
Publication Year1997
Total Pages1228
LanguageHindi, English, Gujarati
ClassificationSmruti_Granth & Articles
File Size68 MB
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